अब सिलसिला तन्हाइयों का रह गया है, यादों के सिवा पिंजड़े मे कुछ भी नहीं है
ग़ज़ल
तेरे बग़ैर ये दुनिया कुछ भी नहीं है
चारों तरफ़ अंधेरा है कुछ भी नहीं है
अब सिलसिला तन्हाइयों का रह गया है
यादों के सिवा पिंजड़े मे कुछ भी नहीं है
हर सिम्त ख़ामोशी दिल भी डरा हुआ है
आहट है सिर्फ़ सांसों की कुछ भी नहीं है
इक आइने के टुकड़े-टुकड़े हो गये हैं
चेहरे हज़ार दिखते पर कुछ भी नहीं है
दरया बनी अश्कों भरी आंखें हमारी
बस इन्तजार आपका औ कुछ भी नहीं है
ईमान की ताक़त से मंज़िल भी मिलेगी
बस लौ लगाए रक्खो औ कुछ भी नहीं है
कश्ती यहां सफ़ीना भी उस पार है जाना
कांधा ज़रा लगाना, अब कुछ भी नहीं है
डॉ शाहिदा