उत्तर प्रदेश में बेसिक शिक्षा विभाग में खुलेआम उड़ाई जा रही है, उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों की धज्जियां

बेलगाम हो चुका है, उत्तर प्रदेश में बेसिक शिक्षा विभाग…

 

माननीय उच्च न्यायालय के फैसले के किसी भी विंदु का कार्यपालिका द्वारा अनदेखी नहीं की जा सकती है क्योंकि यह आदेश सर्वोच्च न्यायालय ने सही मान लिया है। यदि शिक्षक किसी विंदु से असहमत है तो वह तो उस विंदु के विरुद्ध माननीय सर्वोच्च न्यायालय जा सकता है, परंतु सरकार की SLP तो इस आदेश के विरुद्ध माननीय सर्वोच्च न्यायालय से खारिज हो चुकी है।

उत्तर प्रदेश में परिषदीय विद्यालयों के शिक्षकों से प्रभारी प्रधानाध्यापक का कार्य लिया जा रहा है। जिससे असंतुष्ट होकर उच्च न्यायालय में शिक्षकों ने प्रभारी प्रधानाध्यापक का वेतन मांगा तो उच्च न्यायालय की एकल पीठ ने प्रभारी प्रधानाध्यापक के रूप में कार्य करने की तिथि से वेतन का आदेश कर दिया।

एकल पीठ के फैसले के विरुद्ध विभाग दो न्यायमूर्तियों की खंडपीठ में गया तो दो न्यायमूर्तियों ने भी कहा कि प्राथमिक विद्यालयों में 150 से कम बच्चों और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में 100 से कम बच्चों पर विभाग ने प्रधानाध्यापक का पद समाप्त नहीं किया है।

तीन वर्ष के बच्चों की गणना के आधार पर शिक्षकों के पद का निर्धारण करना चाहिए था। जिसको विभाग ने अमल में नहीं लाया है। अतः जिससे जो कार्य लिया जा रहा है उसको उस पद का वेतन मिलना चाहिए।

दो न्यायमूर्ति की खंडपीठ ने लंबे समय से प्रभारी प्रधानाध्यापक का कार्य रहे शिक्षकों को मात्र तीन वर्ष के बकाया वेतन के भुगतान का आदेश किया। क्योंकि प्रभारी प्रधानाध्यापक ने कभी वेतन भुगतान की मांग नहीं की थी।

उच्च न्यायालय के फैसले के विरुद्ध उत्तर प्रदेश सरकार सर्वोच्च न्यायालय गई और सर्वोच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति अरविंद कुमार ने उत्तर प्रदेश सरकार को फटकार लगाते हुए कहा कि आप शिक्षक का सम्मान नहीं कर पा रहे हैं। उनसे जिस काम को ले रहे हैं, उसका वेतन नहीं देना चाहते हैं। उत्तर प्रदेश सरकार की याचिका खारिज कर दिया।

इसके बावजूद भी उत्तर प्रदेश सरकार के अपर मुख्य सचिव बेसिक शिक्षा ने शासनादेश जारी करके प्राथमिक विद्यालय में 150 से कम बच्चों पर और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में सौ से कम बच्चों पर प्रभारी प्रधानाध्यापक का वेतन देने से इनकार कर दिया जो कि उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय की घोर अवमानना है ।

1. कुशमोंडेया शाही, याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता, वी.के. सिंह, वरिष्ठ अधिवक्ता, जिनकी सहायता आलोक कुमार गुप्ता, सुदीर्घ राणा, कमल कुमार केसारवानी, मान बहादुर सिंह, अग्निहोत्री कुमार त्रिपाठी, जितेन्द्र कुमार यादव, अनुराग शुक्ला और पंकज कुमार ओझा, याचिकाकर्ता-प्रतिवादी के अधिवक्ता के रूप में कर रहे हैं, को सुना गया।

2. यह विशेष अपील यूपी बेसिक एजुकेशन बोर्ड द्वारा सचिव के माध्यम से दायर की गई है, जिसमें एकल न्यायाधीश द्वारा पारित आदेश को चुनौती दी गई है। इस आदेश में लंबे समय से हेडमास्टर के रूप में कार्यरत याचिकाकर्ताओं को हेडमास्टर पद का वेतन देने का निर्देश दिया गया था।

मुख्य मामले में, याचिकाकर्ता 2014 से हेडमास्टर के रूप में कार्यरत है, फिर भी उसे हेडमास्टर का वेतन नहीं मिला था। एकल न्यायाधीश ने यह माना कि ऐसे व्यक्ति को उस उच्च पद का वेतन दिया जाना चाहिए, जिस पद पर वह कार्यरत है।

अन्य मामलों में स्थिति लगभग समान है और उन याचिकाओं को इस न्यायालय द्वारा Tripurari Dubey और अन्य बनाम राज्य यूपी और अन्य, Writ-A No. 18228 of 2022 के निर्णय के अनुसार निस्तारित किया गया। एकल न्यायाधीश ने यह पाया कि याचिकाकर्ता 31.05.2014 से हेडमास्टर के कर्तव्य का निर्वहन कर रहा है और हेडमास्टर के पद के लिए योग्य भी है।

इस मामले में इस न्यायालय के पूर्ण पीठ निर्णय Dr. Jai Prakash Narayan Singh बनाम राज्य यूपी, Civil Misc. Writ Petition No. 23627 of 2014, 26 सितंबर, 2014, ADJ 617, सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय Arindam Chattopadhyay और अन्य बनाम राज्य पश्चिम बंगाल और अन्य, (2013) 4 SCC 152 और इस न्यायालय के निर्णय Writ-A No. 3863 of 2018 (Smt. Raj Kishori Kushwaha बनाम राज्य यूपी और अन्य, 07.05.2014) का हवाला दिया गया।

3. याचिकाकर्ता के दावे का प्रतिवाद अपीलकर्ताओं ने किया, जिसमें उन्होंने Madhya Pradesh बनाम R.D. Sharma और अन्य, (2022) 2 Scale 398 के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय पर निर्भरता जताई। पक्षकारों के दावों की जांच करने के बाद, एकल न्यायाधीश ने याचिका स्वीकार कर दी और याचिकाकर्ता को 31.05.2014 से हेडमास्टर का वेतन और बकाया राशि देने का आदेश दिया।

4. एकल न्यायाधीश के निर्णय को निम्नलिखित आधारों पर चुनौती दी गई:

(i) अपीलकर्ताओं का कहना है कि संबंधित प्राथमिक स्कूल में हेडमास्टर पद का निर्धारण RTE Act 2009 की धारा 25 और अनुसूची के अनुसार होता है। अधिकांश प्राथमिक स्कूलों में छात्र संख्या 150 से कम और जूनियर हाई स्कूल में 100 से कम है, इसलिए हेडमास्टर का पद नहीं है और वेतन का प्रश्न ही नहीं उठता। उन्होंने गोरखपुर जिले के दो ब्लॉकों का चार्ट प्रस्तुत किया।

(ii) प्राथमिक और जूनियर स्कूलों के शिक्षकों की योग्यता NCTE अधिनियम के अधिसूचना के अनुसार निर्धारित होती है। 2011 में किए गए संशोधन और 2014 की अधिसूचना के अनुसार, हेडमास्टर पद के लिए TET पास होना आवश्यक है, जो याचिकाकर्ताओं के पास नहीं है।

(iii) अपीलकर्ता ने यह भी कहा कि Dr. Jai Prakash Narayan Singh (supra) का सिद्धांत इस मामले में लागू नहीं होता क्योंकि वह विश्वविद्यालय से संबंधित था, जबकि वर्तमान मामला स्कूलों से संबंधित है।

5. दूसरी ओर, वी.के. सिंह ने Arindam Chattopadhyay और अन्य बनाम राज्य पश्चिम बंगाल और अन्य, (2013) 4 SCC 152, Raj Kishori Kushwaha (supra) और Dr. Jai Prakash Narayan Singh (supra) के निर्णयों का हवाला दिया। उनका तर्क था कि यदि किसी कर्मचारी को प्रबंधन द्वारा उच्च पद पर नियुक्त किया गया है और वह उस पद की जिम्मेदारियाँ निभाता है, तो उसे उस पद का वेतन दिया जाना चाहिए जब तक statute में कोई रोक न हो।

उन्होंने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता ओपन प्रतियोगिता के आधार पर सहायक शिक्षक पद पर नियुक्त किए गए थे और हेडमास्टर पद के लिए भी योग्य हैं। TET योग्यता का अभाव राज्य की चूक है, इसलिए वेतन रोकना अनुचित है।

6. हमने पक्षकारों के वकीलों को सुना और रिकॉर्ड की सामग्री का अध्ययन किया।

7. यह निर्विवाद है कि सभी याचिकाकर्ताओं को सहायक शिक्षक के रूप में नियुक्त किया गया और उनकी सेवा शर्तें U.P. Basic Education (Teachers) Service Rules, 1981 के अंतर्गत नियंत्रित हैं। NCTE अधिनियम के अधिसूचनाओं के अनुसार, TET योग्यता केवल नए नियुक्त कर्मचारियों के लिए आवश्यक है।

8. बोर्ड के अधिवक्ता का कहना है कि 12 नवंबर, 2014 की अधिसूचना के अनुसार हेडमास्टर पद के लिए TET योग्यता आवश्यक है। हेडमास्टर पद Rules of 1981 के अंतर्गत पदोन्नति का (promotional) पद है और इसके लिए कम से कम पांच साल का सहायक शिक्षक के रूप में अनुभव जरूरी है। TET की आवश्यकता केवल 2010 के बाद लागू हुई।

9. श्री कुशमोंडेया शाही, अपीलकर्ताओं के अधिवक्ता, का पहला तर्क यह है कि अधिकांश शिक्षक हेडमास्टर पद के लिए TET योग्यता नहीं रखते।

10. Rules of 1981 के अनुसार, सहायक शिक्षक से हेडमास्टर पद पर पदोन्नति के लिए केवल पांच साल का अनुभव आवश्यक है। ऐसे अनुभवहीन शिक्षक हेडमास्टर पद का वेतन पाने के पात्र नहीं हैं। संबंधित प्राधिकारी व्यक्तिगत मामलों की जाँच कर सकते हैं।

11. TET योग्यता का अभाव, जब तक राज्य उचित व्यवस्था न करे, वेतन रोकने का आधार नहीं है। सहायक शिक्षक जो हेडमास्टर के कार्य कर रहे हैं, उन्हें वेतन मिलेगा। यदि राज्य उन्हें TET परीक्षा देने का अवसर नहीं देता, तो वेतन रोकना अनुचित होगा।

12. हेडमास्टर पद की आवश्यकता: याचिकाकर्ता का कहना है कि सभी संस्थानों में हेडमास्टर पद पहले से था। RTE Act के अनुसार न्यूनतम शिक्षक संख्या सुनिश्चित करनी होती है।

13. RTE Act धारा 25 और अनुसूची के अनुसार, प्रत्येक स्कूल में न्यूनतम शिक्षक संख्या सुनिश्चित करनी होती है। उच्च संख्या के पदों को स्वतः समाप्त नहीं माना जाएगा।

14. यदि छात्र संख्या कम है, तो नियोक्ता को तीन वर्ष के लिए आवश्यक शिक्षक पदों का पुनर्निर्धारण करना होगा, जो अभी तक नहीं किया गया है।

15. अपीलकर्ताओं ने छात्र संख्या के आधार पर हेडमास्टर पद की संख्या कम दिखाने के लिए चार्ट प्रस्तुत किया, लेकिन न्यायालय ने इसे गैर-व्यावहारिक और असंगत बताया।

16. सहायक शिक्षक जो हेडमास्टर का कार्य कर रहे हैं, उन्हें अतिरिक्त प्रशासनिक और पर्यवेक्षकीय कार्य का वेतन दिया जाएगा। Full Bench ने यह सिद्धांत पहले ही मान्यता दी है।

17. अतः, हेडमास्टर के रूप में नियमित कार्य कर रहे सहायक शिक्षकों का वेतन रोकना उचित नहीं होगा।

18. अपीलकर्ता ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने पहले कोई शिकायत नहीं की थी। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के अनुसार, अधिकतम तीन साल तक के बकाया वेतन ही दिया जा सकता है।

19. न्यायालय ने माना कि बकाया वेतन केवल तीन वर्ष पूर्व तक ही दिया जाएगा।

20. आदेश:

(i) जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी याचिकाकर्ता के अनुभव और हेडमास्टर पद पर कार्यरत होने का तथ्य जाँचेंगे।

(ii) बकाया वेतन केवल तीन साल पूर्व तक होगा।

(iii) केवल वरिष्ठ सहायक शिक्षक को ही हेडमास्टर का कार्य सौंपा जाएगा।

(iv) यह कार्य दो महीने के भीतर पूरा किया जाएगा और वेतन जारी किया जाएगा।

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