योगी की सियासत से चित्त हुए स्नातक एमएलसी देवेंद्र प्रताप सिंह, विभागीय टीईटी के कठिन प्रश्नपत्र ने शिक्षकों में पैदा की नाराजगी
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की शिक्षक राजनीति में इन दिनों एक दिलचस्प घटनाक्रम देखने को मिल रहा है। गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के हालिया चुनाव में स्नातक एमएलसी देवेंद्र प्रताप सिंह द्वारा समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी संजयन त्रिपाठी का समर्थन किए जाने के बाद उनकी राजनीतिक भूमिका चर्चा के केंद्र में आ गई है। उनके इस कार्य से शिक्षक समाज में खासी नाराजगी देखने को मिल रही है।
बताया जा रहा है कि भाजपा के क्षेत्रीय अध्यक्ष विनोद राय द्वारा कथित अपमान से आहत होकर देवेंद्र प्रताप सिंह ने यह राजनीतिक कदम उठाया। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम को केवल भाजपा के अंदरूनी विवाद तक सीमित करके देखना शायद उचित नहीं होगा। इसके पीछे शिक्षक राजनीति और योगी सरकार के बीच बने समीकरणों की कहानी भी है।
दरअसल, देवेंद्र प्रताप सिंह लंबे समय से शिक्षकों के टीईटी संबंधी मामले को लेकर सक्रिय रहे हैं। 1 सितंबर, 2025 को सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने आरटीई एक्ट लागू होने से पूर्व नियुक्त उन शिक्षकों के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी थी, जिनकी सेवा में पांच वर्ष से अधिक समय शेष था। फिर भी शिक्षकों के दिलोदिमाग में एक अलग तरह का प्रेशर बना हुआ है।
न्यायालय ने ऐसे शिक्षकों के लिए टीईटी उत्तीर्ण करना अनिवार्य कर दिया था। इसके लिए प्रारंभिक समय सीमा 1 सितंबर, 2027 निर्धारित हुई थी। टीईटी उत्तीर्ण नहीं करने की स्थिति में संबंधित शिक्षकों की सेवा पर संकट आना तय था। इस कठिन परिस्थिति में देवेंद्र प्रताप सिंह ने योगी सरकार के सामने शिक्षकों की मांगों को प्रमुखता से उठाया। सरकार ने उनकी मांगों पर सकारात्मक कार्रवाई की।
उत्तर प्रदेश सरकार की पुनर्विचार याचिका पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने टीईटी उत्तीर्ण करने की अंतिम समय सीमा बढ़ाकर 1 सितंबर, 2028 कर दी। इससे शिक्षकों को एक वर्ष का अतिरिक्त समय मिल गया। इसके बाद देवेंद्र प्रताप सिंह की मांग पर यूपीटीईटी 2026 की परीक्षा आयोजित हुई। पेपर का स्तर सरल होने के कारण इस परीक्षा में बड़ी संख्या में शिक्षकों ने सफलता प्राप्त की।
इसके अतिरिक्त देवेंद्र प्रताप सिंह ने शिक्षकों के लिए अलग से विभागीय टीईटी आयोजित कराने की मांग भी की, जिसे योगी सरकार ने स्वीकार कर लिया। लेकिन यहीं से कहानी ने नया मोड़ ले लिया। 3 नवंबर, 2026 को आयोजित विभागीय टीईटी का प्रश्नपत्र सामने आया तो शिक्षकों की उम्मीदों पर पानी फिर गया। शिक्षकों के अनुसार प्रश्नपत्र का स्तर सामान्य टीईटी की तुलना में काफी कठिन था।
जिस विभागीय परीक्षा को शिक्षक अपने लिए अतिरिक्त अवसर और राहत के रूप में देख रहे थे, वही परीक्षा उनके लिए नई परेशानी बन गई। अब शिक्षकों के बीच इस बात को लेकर नाराजगी दिखाई देने लगी कि आखिर विभागीय टीईटी की मांग क्यों की गई ? इसके पीछे राजनीतिक नफा नुकसान ने शिक्षकों के लिए नई समस्या खड़ी कर दी है। जिसकी पूरे प्रदेश में चर्चा हो रही है।
सबसे ख़ास बात यह रही कि जिस नेता से शिक्षक राहत की उम्मीद कर रहे थे, उसी देवेंद्र प्रताप सिंह को सोशल मीडिया पर आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। शिक्षक उनके प्रयासों के परिणाम और विभागीय टीईटी के स्वरूप पर सवाल उठाने लगे। यहां योगी सरकार की सियासत का एक दिलचस्प पहलू सामने आता है। यक्ष प्रश्न यह कि एमएलसी का स्वाभिमान शिक्षकों के हित से बड़ा कैसे हो गया ?
एमएलसी देवेंद्र प्रताप सिंह ने शिक्षकों के लिए विभागीय टीईटी की मांग की, सरकार ने उनकी मांग मान ली, लेकिन परीक्षा का कठिन प्रश्नपत्र शिक्षकों की नाराजगी का कारण बन गया। इस प्रकार जिस मांग को देवेंद्र प्रताप सिंह अपनी उपलब्धि के रूप में शिक्षकों के सामने रख सकते थे, वही उनके लिए राजनीतिक असहजता का कारण बन गई। अब तो देवेंद्र प्रताप सिंह की स्थिति सांप छंछूदर जैसी हो गई है।
राजनीतिक दृष्टि से इसे योगी सरकार की एक ऐसी रणनीतिक स्थिति के रूप में देखा जा सकता है, जिसमें सरकार ने मांग स्वीकार करने के बावजूद उसका राजनीतिक लाभ मांग उठाने वाले नेता को मिलने की परिस्थितियां नहीं बनने दीं। क्योंकि उस नेता द्वारा सरकार के साथ हुई सार्थक बातचीत के बाद भी अपने कथित मान सम्मान और स्वाभिमान को आगे कर भाजपा उम्मीदवार के जमकर विरोध किया।
हालांकि प्रश्नपत्र का स्तर किसके निर्देश पर निर्धारित हुआ और इसके पीछे कोई राजनीतिक मंशा थी या नहीं, इसका कोई पुष्ट प्रमाण सामने नहीं है। फिर भी इसका राजनीतिक परिणाम स्पष्ट रूप से चर्चा का विषय बन गया है। यह सच है कि सरकार के पास बहुत ताकत होती है और वह बहुत कुछ कर सकती है। अदालत के निर्णय पर संसद के दोनों सदनों से नया कानून पास करके उसे निष्प्रभावी बना सकती है।
अब सवाल यह भी है कि क्या देवेंद्र प्रताप सिंह को भाजपा के भीतर मिले कथित अपमान से अधिक चोट शिक्षक समुदाय में पैदा हुई नाराजगी से पहुंची है ? क्या योगी सरकार ने उनकी मांगों को स्वीकार करके उन्हें जिस राजनीतिक ऊंचाई पर पहुंचने का अवसर दिया था, उनकी बगावत के बाद विभागीय टीईटी के कठिन प्रश्नपत्र ने उसी उपलब्धि को उनके लिए राजनीतिक चुनौती में बदल दिया ?
एक ओर योगी सरकार शिक्षकों के टीईटी संबंधी मामले में समयसीमा बढ़वाने और परीक्षा के अवसर उपलब्ध कराने का श्रेय ले सकती है, वहीं दूसरी ओर एमएलसी देवेंद्र प्रताप सिंह को यह जवाब देना पड़ रहा है कि विभागीय टीईटी शिक्षकों के लिए राहत का माध्यम बनने के बजाय इतनी कठिन क्यों हो गई ? यहाँ तो पूरा मामला ही फेल हो गया। शिक्षक स्वयं को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।
शिक्षक राजनीति में यह घटनाक्रम एक महत्वपूर्ण संदेश देता है। केवल मांग मनवा लेना पर्याप्त नहीं होता, उस मांग के क्रियान्वयन का परिणाम भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। क्योंकि राजनीति में कई बार जिस उपलब्धि को लेकर कोई नेता जनता के बीच जाता है, उसी उपलब्धि का परिणाम उसके लिए असहज स्थिति पैदा कर देता है। वह कहीं का नहीं होता, उसकी स्थिति धोबी के कुत्ते के सामान हो जाती है।
फिलहाल एमएलसी देवेंद्र प्रताप सिंह का सपा प्रत्याशी संजयन त्रिपाठी को समर्थन देना और विभागीय टीईटी को लेकर शिक्षकों की नाराजगी, दोनों घटनाएं शिक्षक राजनीति में नए समीकरणों की ओर संकेत कर रही हैं। सूबे में साल- 2027 में विधानसभा चुनाव भी होने हैं। ऐसे में सरकार भी जो निर्णय लेगी, वह सोच समझकर ही लेगी। ताकि शिक्षक समाज का वोटबैंक प्रभावित न हो।