बेशकीमती नजूल सरकार की सम्पत्ति को हड़पने हेतु सुल्तान हसन स्वघोषित मालिक बना और होटल संचालक को बना लिया अपना किरायेदार

नजूल सरकार की सम्पत्ति को हथियाने के लिए गोपाल हिन्दू होटल के संचालक राम नारायन रावत से सुल्तान हसन ने की थी, दुरभि संधि
प्रतापगढ़। कोतवाली नगर क्षेत्र प्रयागराज-अयोध्या राष्ट्रीय राजमार्ग-330 पर कपूर चौराहा स्थित बेल्हाघाट की गाटा संख्या- 1016 नजूल सम्पत्ति पर अवैध कब्जा करने वाले सुल्तान हसन के पिता मोहिउद्दीन के सम्बन्ध में उन लोगों को जान लेना आवश्यक है, जिन्हें ये नहीं पता कि बेशकीमती नजूल सरकार की भूमि पर अवैध कब्ज़ा करने, उसका कथित और स्वघोषित मालिक बनने से मालिकाना हक नहीं मिल जाता।
सुल्तान हसन का पिता मोहिउद्दीन जनपद इलाहाबाद के मऊआइमा कस्बे का रहने वाला व्यक्ति था। उसने साल- 1938 में प्रतापगढ़ शहर के धर्मशाला वार्ड में रमजान अली नामक व्यक्ति का मकान किराए पर लेकर यहां रहना शुरू किया। यह मकान मोहल्ला धर्मशाला वार्ड में शिरिंग गली की तरफ कच्चा बना हुआ था और इसका क्षेत्रफल लगभग 1800 वर्ग फिट था। इस मकान का निकास पैठास पूरब तरफ गली में तथा उत्तर तरफ सिब्तैन रोड पर था। इस मकान के पश्चिम तरफ मुख्य सड़क प्रयागराज-अयोध्या राष्ट्रीय राजमार्ग-330 पर लगभग 1800 वर्ग फीट सरकारी भूमि खाली पड़ी थी।
दरअसल यह भूमि सड़क से लगभग 5 फीट नीचे थी और आज भी है। द्वितीय विश्व युद्ध के समय इस भूमि पर तीन व्यक्तियों ने छान छप्पर डालकर चाय पानी भोजनालय का काम शुरू कर दिया। भारत के बंटवारे के समय रमजान अली भारत छोड़कर चला गया। फलस्वरूप उसका खुद का रिहायशी मकान और बगल में मोहिउद्दीन को दिया गया किराए का मकान शत्रु संपत्ति अंकित हो गया। रमजान के रिहायशी मकान को सरकारी व्यवस्था के तहत नीलामी में डॉक्टर इंद्रदेव निगम ने खरीद लिया, जिनके वंशज आज भी दक्षिण दिशा में काबिज हैं। थोड़ी देर के लिए मोहिउद्दीन के नाम नजूल सम्पत्ति का पट्टा भी मान लेते हैं तो भी उक्त सम्पत्ति शत्रु सम्पत्ति ही होगी।
मोहिउद्दीन ने अपने कब्जे वाले मकान पर दावा पेश किया। उसके पक्ष में कोई आदेश नहीं हुआ, किंतु वह उस कच्चे मकान में अध्यासित रह गया। हालांकि वर्ष- 1951 में मोहिउद्दीन भी पाकिस्तान करांची चला गया और पाकिस्तान जाने के पहले उसने अपने लड़के सुल्तान हुसैन के पक्ष में मऊआइमा की संपत्ति हिबा कर दी थी। बाद में सुल्तान हुसैन भी पाकिस्तान करांची चला गया। मोहिउद्दीन का दूसरा लड़का सुल्तान हसन था, जो मोहिउद्दीन के पाकिस्तान करांची चले जाने पर उस कच्चे मकान में काबिज हुआ। उसी में रहते हुए सुल्तान हसन की नियत खराब हुई और इस बेशकीमती भूमि को पाने के लिए परेशां रहने लगा।
हालांकि सुल्तान हसन पारिवारिक सुलह समझौते के बाद मऊआइमा चला गया और प्रतापगढ़ का कच्चा मकान वर्ष- 1979-80 की बाढ़ में ध्वस्त हो गया। वर्ष- 1985 के आसपास सुल्तान हसन ने जालसाजी कर उस कच्चे मकान को नगरपालिका के अभिलेख में अपने नाम दर्ज कर लिया और उसके बाद 1800 वर्गफिट की भूमि पर पक्का मकान बना लिया, जिस पर वह आज भी काबिज है। इस मकान का निकास पैठास उत्तर तरफ सिब्तैन रोड पर है। पक्का मकान बनाने के बाद सुल्तान हसन की नियत पश्चिम तरफ खाली पड़ी नजूल सरकार की जमीन पर गड़ गई, जिसमें कुछ लोग छप्पर डालकर भोजनालय चलाते थे।
चालाक किस्म का सुल्तान हसन इन्हें लालच देते हुए पहले इन्हें अपना किराएदार बनाया और इनके साथ दुरभि संधि कर सिविल कोर्ट में किरायेदार को बेदखली का मुकदमा किया। अब तक किरायेदार को समझ आ गई थी कि उसके साथ सुल्तान हसन छल कर रहा है। चूँकि होटल संचालक के पास भी आजीविका का वही एक मात्र आधार था। इसलिए होटल संचालक सुल्तान हसन से कोर्ट में मुकदमा लड़ने लगा। होटल संचालक भी नजूल सम्पत्ति का पट्टा प्राप्त करने के लिए हाईकोर्ट इलाहाबाद खंडपीठ लखनऊ में याचिका दाखिल किया, जहाँ से निर्देश जारी हुआ कि जिलाधिकारी प्रतापगढ़ के समक्ष अपना आवेदन प्रस्तुत करें।
फिलहाल इस भूमि पर होटल चला रहे लोगों के द्वारा भी भूमि आवंटित करने हेतु प्रार्थना पत्र दिया गया था, किंतु वह भी निरस्त कर दिया गया था। सुल्तान हसन ने भी वर्ष- 2003 में इस रिक्त पड़ी भूमि को स्वयं को पट्टा दिए जाने हेतु आवेदन किया, किंतु तत्कालीन जिलाधिकारी महोदय द्वारा उसका आवेदन भी निरस्त कर दिया। इस प्रकार वह लगभग 1800 वर्गफिट भूमि छान छप्पर हट जाने के बाद बंजर पड़ी थी, जिसमें झाड़ झंखाड़ और बड़े-बड़े पेड़ उग आये थे। इसी बीच सुल्तान हसन द्वारा सिविल कोर्ट से मुकदमें में डिग्री प्राप्त कर उसका स्वघोषित मालिक बन बैठा। क्योंकि किरायेदारी के मुकदमें में सुल्तान हसन उक्त भूमि के संबंध में मालिकाना हक के कोई कागजात नहीं जमा किये थे।
हालांकि होटल संचालक अपने छान छप्पर वहां से पहले ही हटा चुके थे। माह मई के दूसरे सप्ताह में प्रयागराज-अयोध्या राजमार्ग-330 की चौड़ीकरण में आ रहे अवरोध को देखते हुए सड़क पर मौजूद मंदिर को इस भूमि पर स्थानांतरित करने की चर्चा शुरू होने पर उक्त सुल्तान हसन ने रातों-रात इस भूमि में मौजूद पेड़ को काटकर झाड़ झंकाड़ साफ कर दिया और लोहे के खंभे खड़े कर सारी भूमि को टीन की चद्दर से घेर लिया। जिसकी शिकायत जिलाधिकारी प्रतापगढ़ के समक्ष की गई। इस संपूर्ण प्रकरण का एक दु:खद पक्ष यह है कि निचले स्तर के कुछ कर्मचारियों द्वारा सुल्तान हसन के साथ दुरभि संधि कर उसे यह मूल्यवान भूमि को लेने की सुविधा प्रदान की है।
यही लोग यह चाहते हैं कि यह भूमि शासन के अध्यासन में वापस न आने पाए और मामले को कानूनी दांव पेंच में उलझा दिया जाए। उच्च न्यायालय में सुल्तान हसन द्वारा दाखिल याचिका में प्रस्तुत अभिलेखों में या उल्लेख किया गया है कि यह भूमि नजूल भूमि थी और यह उसके पिता को पट्टे पर दी गई थी, जिसकी अवधि समाप्त हो चुकी है और उसने उसके नवीनीकरण का आवेदन प्रस्तुत कर रखा है। किंतु सुल्तान हसन ऐसे किसी पट्टे का अभिलेख किसी को नहीं दिखाता और न ही जिला कलेक्टर कार्यालय में उसके द्वारा नवीनीकरण के कथित आवेदन का कोई प्रमाण मिलता है। इस तरह सुल्तान हसन के पास उक्त भूमि के मालिकाना हक से सम्बन्धित कोई वैध कागजात नहीं है।