कांग्रेस हाईकमान का मास्टरस्ट्रोक भी हुआ धड़ाम, बिना सूचना यूपी के प्रदेशध्यक्ष पद से अजय राय को हटाना कालिदास बनने जैसा है

भारत माता की जय का नारा अनुशासनहीनता है, मानने वाले मोना मिश्रा को प्रदेश अध्यक्ष व बोटी-बोटी वाले इमरान मसूद को कांग्रेस ने यूपी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाने से नहीं बनेगी बात…
लखनऊ। UP की राजनीति में बड़ा धमाका हो सकता है। अजय राय पहले BJP से 3 बार विधायक। अब सोचिए अगर अजय राय इसे ईगो में लेकर फिर से BJP में चले गए तो क्या होगा ? सूत्रों ने बड़ी खबर ये दी है कि अजय राय की नाराजगी दूर नहीं की गई तो तो वो कोई भी बड़ा फैसला ले सकते हैं।
बनारस के पूर्व विधायक अजय राय के बड़े भाई अवधेश राय की 3 अगस्त, 1991 को वाराणसी में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। साल- 2023 में इस मामले में मुख्तार अंसारी को उम्रकैद हुई थी। माफिया मुख्तार और सपा की करीबी सब जानते हैं।
कांग्रेस ने अजय राय को उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष पद से हटा दिया। बेचारे ने राफेल का मज़ाक उड़ाया। ऑपरेशन सिंदूर का मजाक उड़ाया। पीएम मोदी जी को माँ की गालियां तक दीं, लेकिन कुछ काम नहीं आया। ऐन चुनाव से पहले इनको इनकी जगह दिखा दी गई। पद से हटने के बाद अजय राय का क्या होगा ?
अजय राय UP कांग्रेस के उन नेताओं में रहे हैं जो राज्य में पार्टी के ‘एकला चलो रे’ के पक्षधर रहे हैं। वो लगातार सड़कों पर थे। वो कांग्रेस को UP में मजबूत करना चाहते थे। सपा से उनकी तल्खियाँ रही हैं। अगर आप सबको याद होगा तो साल- 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की सहयोगी समाजवादी पार्टी ने गाजीपुर से मुख्तार के भाई अफजाल को उम्मीदवार बनाया तो अजय राय ने सार्वजनिक रूप से साफ किया था कि वे प्रचार नहीं करेंगे।
भाजपा में मोदी और शाह की तर्ज पर कांग्रेस भी चौकाने वाले फैसले लेकर जनता को बताना चाहती है कि वह भी भाजपा के चाणक्य की तरह निर्णय ले सकती है। कांग्रेस ने बिना सूचना दिए ही अपना प्रदेश अध्यक्ष बदल दिया। कल तक इस पद पर बनारसी बाबू अजय राय आसीन रहे और देर रात कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने बिना सूचना अजय राय को उत्तर प्रदेश के प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा दिया। उनकी जगह अब प्रतापगढ़ की रामपुर ख़ास विधानसभा सीट से तीन बार की विधायक और विधान मंडल दल की नेता आराधना मिश्र मोना को कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने जिम्मेदारी दी है।
कांग्रेस एक से एक नग नगीनो को यूपी कांग्रेस का अध्यक्ष बनाती है जो “भारत माता की जय के नारे मत लगाइए, ये अनुशासनहीनता है। अगर नारा ही लगाना है तो और भी नारे हैं। आप लोग कांग्रेस की जय हो के नारे लगाइए। आराधना मिश्रा ने कहा था कि जो जो भारत माता की जय बोलेगा, उस पर कार्रवाई करेंगे। अब इन्हीं को कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश का अध्यक्ष बनाया है, जिनके अनुसार भारत माता की जय का नारा अनुशासनहीनता है। कांग्रेस के लिए सिर्फ एक परिवार, सिर्फ एक पार्टी ही सब कुछ है, उनके लिए देश कुछ भी नहीं।
मुस्लिम इमरान मसूद से अट्रैक्ट भले हो जाएं, पर ब्राह्मण आराधन मिश्रा से अट्रैक्ट होंगे, ऐसा संभव ही नहीं है। जो कुछ संभावना ऐसी बन सकती थी, उसे कांग्रेस ने ओबीसी एक्ट की मांग करके धराशायी कर दिया है। दो नावों की सवारी में टांगे फट जाती हैं, जबकि कांग्रेस तो एक साथ तीन नाव लेकर चुनावी भंवर में कूदी है। यह दोनों फैसले गांधी परिवार के पारिवारिक विवाद और बहन प्रियंका से खींचतान में लिए गए फैसले हैं।
असल में यूजीसी से ब्राह्मणों की नाराजगी का फायदा उठाने के लिए और सपा से मोलभाव के अपर हैंड रखने के लिए यह दोनों फैसले लिए हो, परन्तु यह निर्णय आपस में विरोधाभाषी हैं। इस पारिवारिक खींचतान के मामले में परस्पर विरोधी राजनीति के फैसले में मास्टरस्ट्रोक ढूंढना मास्टर स्ट्रोक शब्द की बेईज्जती है। राहुल गांधी ओबीसी दलित और मुस्लिम की राजनीति करना चाहते हैं, जबकि प्रियंका वाड्रा कांग्रेस के पुराने दलित मुस्लिम ब्राह्मण फार्मूले पर पार्टी को लाना चाहती हैं।
ऐन चुनाव से पहले इनको इनकी जगह दिखा दी गई, अब कांग्रेस का बंटाधार करने वाले प्रमोद कुमार की बेटी के हाथ मे UP की कमान है, जबकि बोटी-बोटी वाले इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है। राहुल गांधी खुद विरोधाभास में जीने वाले नेता हैं। प्रधानमंत्री कार्यालय से लेकर मेदांता अस्पताल डॉक्टरों की लिस्ट में जाति खोजने वाले कर्नाटक के एकमात्र ओबीसी मुख्यमंत्री तक को बरकरार नहीं रख पाए। एक चेहरा दे दो, पूरी जाति खुश। आज युवाओं को पता तक तो रहता नहीं कि उनके पड़ोस गांव के फलाने राज्य मंत्री हैं या दर्जा प्राप्त मंत्री है।
कांग्रेस कंफ्यूजन की राजनीति कर रही है और स्वयं ही कंफ्यूज भी हो रही है। जनता उसकी कंफ्यूजन की राजनीति में नहीं फंसेगी। साफ कहूं तो कोई मास्टरस्ट्रोक नहीं है। साथ-साथ कार्यकारी अध्यक्ष इमरान मसूद को बनाकर कांग्रेस ने अपने घटिया इरादे की झलक दे दी है।असल में कांग्रेस के नीति नियंता आज भी 1960-1990 के लोकतंत्र में जी रहे हैं, जहां सिंबॉलिज्म की राजनीति वास्तविक राजनीति से बड़ी मानी जाती थी।