एक मुट्ठी चावल मांगकर झारखंड बनाने वाले शिबू सोरेन का जीवन भले ही समाप्त हुआ हो, परन्तु वह आदिवासी समाज के लिए अमर हो गए
वर्ष- 2000 में जब झारखंड बना तो बिहार में एक गाना गाया जाता था ‘अलग भईल झारखंड, अब खईहे, शकरकंद।’ यानी झारखंड के पास गेहूं चावल जैसे अनाज पर्याप्त मात्रा में नहीं है। शिबू सोरेन से साल- 2009 में जब मैं एक मात्र बार मिला तब उनसे ‘शकरकंद’ वाले तंज पर पूछा था।
उन्होंने कहा था लोग नहीं जानते हमने तो झारखंड के घरों से एक-एक मुट्ठी चावल मांगकर अपने आंदोलन को आर्थिक सशक्तिकरण दिया। हमने पूछा, चावल क्यों ? उन्होंने कहा, जिस दौर में लोगों के पास पर्याप्त मात्रा में चावल नहीं होता था, उस दौर में कोई आपको अपना ‘सीधा’ (खाने का अनाज) दे दे, यह खुद को भूखा रखकर अपनी पहचान को आवाज देना था।
दरअसल, चावल मांगना उनका सबसे प्रभावशाली अभियान था, जिसमें उन्होंने लोगों से “एक मुट्ठी चावल” मांगा। यह प्रतीकात्मक अपील केवल आर्थिक सहयोग नहीं था, बल्कि भावनात्मक जुड़ाव की एक मिसाल थी। इस अभियान ने गांव-गांव में चेतना की लौ जलाई और आमजन को झारखंड संघर्ष में सहभागी बना दिया। शिबू सोरेन की कहानी हमें यह सिखाती है कि अगर उद्देश्य सच्चा हो और इरादे मजबूत हों, तो कोई भी परिवर्तन संभव है। वे न केवल झारखंड, बल्कि पूरे देश के लिए प्रेरणा स्रोत हैं।
दिशोम गुरु न केवल एक राजनेता बल्कि एक जननायक रहे, जिन्होंने क्षेत्रीय अस्मिता, पहचान और हक-अधिकार की लड़ाई को नई दिशा दी। आदिवासी समाज के अधिकारों की रक्षा के लिए उन्होंने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। जिसे कोई माने या न माने, परन्तु झारखंड का आदिवासी समाज तो मानेगा ही और झारखंड के इतिहास में शिबू सोरेन अमर हो गए।
गुरु जी को अंतिम जोहार- अमित त्यागी।