डीएम शिव सहाय अवस्थी ने फाइलें सीज कर पेशकार को किया सस्पेंड, जांच जारी
प्रतापगढ़। एक दिन पहले सदर तहसील की फाइलें प्रिंटिंग प्रेस में मिलने से हड़कंप मच गया, परन्तु हकीकत यह है कि जिला प्रशासन और तहसील प्रशासन का एक अदना सा चपरासी भी पवन प्रेस नहीं पहुँच सका। वजह जे छिनरा वो डोली संग। बिना तहसील प्रशासन की मिलीभगत से कोर्ट की हस्ताक्षर शुदा फाइलें किसी प्रेस में कैसे पहुँच सकती है ?
सच बताएं तो एक लाइन में ये कहना गलत न होगा कि निश्चित रूप से बिना कोर्ट के पेशकार अथवा अहलमद व रजिस्ट्रार कानून गो एवं कोर्ट के प्राइवेट मुंशी के सहयोग से ही ये फाइलें पवन प्रेस गई होंगी। इसके लिए हाकिम भी जिम्मेदार होते हैं, परन्तु यहाँ तो हर क्षेत्र में बलि का बकरा बनाने की परम्परा पूरी तरह कायम है। कभी भी बड़े अफसरों को जिम्मेदार नहीं बनाया जाता और न ही उन पर कार्यवाही ही की जाती है।
सही मायने में पीठासीन अधिकारी फाइलों में हस्ताक्षर किये और अपना हिस्सा अपनी जेब में रखे, उन्हें सिर्फ अपने हिस्से से मतलब रहता है, बाकी फाइलें भाड़ में जाए, जिस तरह कहावत है कि पंडित आपन दक्षिणा पायें, फिर वर मरे अथवा कन्या। जबकि देश के पीएम और सूबे के मुखिया योगी आदित्यनाथ जी भ्रष्टाचारबी के मामले में जीरो टोलरेंस का दावा करते हैं, जबकि हकीकत कुछ और ही है।
इतना सब हो जाने के बाद देर शाम जब सोशल मीडिया पर सदर तहसील के काले कारनामें उजागर हुए तो जिलाधिकारी महोदय ने CRO प्रतापगढ़ को उक्त प्रकरण में जाँच अधिकारी बनाया है और पवन प्रेस को सीज करने सहित पेशकार को सस्पेंड करने की खबर जिला सूचना अधिकारी प्रतापगढ़ के मध्यम से सूचना ऑफिस प्रतापगढ़ के व्हाट्सएप के ग्रुप पर पोस्ट कराई गई।
इन सबके बीच बड़ा सवाल यह है कि किस पेशकार को सस्पेंड किया गया ? जब इस बात को स्पष्ट करने के लिए खुलासा इंडिया ने जिला सूचना अधिकारी से सम्पर्क किया तो वह कुछ स्पष्ट बता न सकी और मौखिक रूप से ADM प्रतापगढ़ के निर्देश पर ऐसी खबर पोस्ट करने की बात कहकर अपना पल्ला झाड़ लिया गया। एक दूसरे के कंधे पर जिम्मेदारी डालकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो लेना ही आज का सिद्धांत हो चुका है।
सदर तहसील में एसडीएम कोर्ट में एक पेशकार रामकुमार हैं। एसडीएम न्यायिक की कोर्ट में एक पेशकार राम आसरे हैं और तहसीलदार सदर कोर्ट एवं तहसीलदार न्यायिक कोर्ट में एक ही पेशकार से काम चलाया जा रहा है। वहाँ अभी सतीश तिवारी को तैनात किया गया है। यदपि कि पेशकार सतीश तिवारी का इतिहास पाकसाफ नहीं है, वह जेल भी जा चुके हैं।
मजेदार बात यह है कि तीन राजस्व कोर्ट नायब तहसीलदार की हैं। जो पत्रवालियां पवन प्रेस में मिली, वह नायब तहसीलदार कोर्ट की हैं। जबकि नायब तहसीलदार कोर्ट में कोई पेशकार नहीं है। उनकी कोर्ट में रजिस्ट्रार कानून गो (आरके) की नियुक्ति है। फिर जिलाधिकारी महोदय द्वारा किस पेशकार को सस्पेंड किया है ? अभी अधिकृत आदेश को सार्वजानिक नहीं किया गया है। सब आदेश मौखिक है।
राजस्व विभाग पूरी तरह भ्रष्टाचार के आकण्ठ डूबा हुआ है। राजस्व विभाग में अनियमितता का इस कदर बोलबाला है कि विरोध करने की किसी में हिम्मत नहीं है। राजस्व विभाग में रिश्वतखोरी चरम पर है। बिना धन दिए छोटा से छोटा कार्य नहीं हो सकता। सबके रेट फिक्स हैं। आधा से अधिक ठेका तो प्राइवेट मुंशी लेते हैं। यही मुंशी ही सारा कार्य देखते हैं।
सूत्रों की बातों पर यकीन करें तो तहसीलों से जो धन रिश्वतखोरी और ऊपरी कमाई से एकत्र होता है, जिसका बंदरबांट नीचे से ऊपर तक बड़ी इमानदारी से किया जाता है। इसलिए जिलाधिकारी से लेकर मंडलायुक्त तक इस खेल को जानते व समझते रहते हैं। सिर्फ जाँच और निलंबन करने की खानापूर्ति करके जनता का ध्यान भटकाया जाता है। यही हकीकत है जिसे लोग सुनना नहीं चाहते।