धोखाधड़ी एवं जालसाजी के आरोपी जितेन्द्र कुमार अग्रवाल गिरफ्तारी से बचने के लिए हाईकोर्ट इलाहबाद में दाखिल की थी, रिट याचिका
7करोड़, 26लाख, 28हजार, 700 की धनराशि का गबन, धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात, जालसाजी, कूटरचित अभिलेखों का उपयोग तथा अन्य गंभीर संज्ञेय अपराध कारित वाले भी चाहते हैं कि उनकी गिरफ्तारी न हो…
प्रयागराज। कोर्ट नंबर – 48 माननीय जस्टिस चंद्रधारी सिंह, माननीय जस्टिस तरुण सक्सेना की कोर्ट में CRIMINAL MISC. WRIT PETITION No. – 20759 of 2026 के तहत अपनी गिरफ्तारी की डर से संस्था के तत्कालीन अध्यक्ष जीतेंद्र कुमार गोयल ने एक रिट याचिका दाखिल की थी। हाईकोर्ट इलाहबाद ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व आदेश का हवाला देते हुए रिट डिस्पोज कर दिया। आदेश में छः विन्दुओं का हवाला दिया है।
1. यह रिट याचिका केस क्राइम नंबर 0325/2026 (धारा 406 IPC, थाना अकबरपुर, जिला कानपुर देहात) में 05.08.2026 को दर्ज FIR को रद्द करने और प्रतिवादियों को निर्देश देने के लिए दायर की गई है कि वे इस FIR के आधार पर याचिकाकर्ता को गिरफ्तार न करें।
2. याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने मामले के गुण-दोष पर लंबी बहस के बाद एक सामान्य सी प्रार्थना की कि याचिकाकर्ता को गिरफ्तार करने से पहले पुलिस को ‘अनेश कुमार बनाम बिहार राज्य’ (2014) 8 SCC 273 मामले में माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए सिद्धांतों का पालन करने का निर्देश दिया जाए।
3. इसके विपरीत, राज्य की ओर से पेश A.G.A. ने मामले के गुण-दोष के आधार पर याचिका का विरोध किया, लेकिन उन्हें याचिकाकर्ता के वकील की सामान्य प्रार्थना पर कोई आपत्ति नहीं थी।
4. याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील और राज्य की ओर से पेश A.G.A. को सुना गया और रिकॉर्ड देखा गया।
5. याचिकाकर्ता के वकील की दलीलों और सामान्य प्रार्थना तथा राज्य-प्रतिवादियों की ओर से पेश A.G.A. की कोई आपत्ति न होने को ध्यान में रखते हुए, हम याचिकाकर्ता के वकील की सामान्य प्रार्थना को स्वीकार करने के पक्ष में हैं।
6. यह रिट याचिका इस निर्देश के साथ निस्तारित की जाती है कि संबंधित अधिकारी ‘अनेश कुमार बनाम बिहार राज्य’ (2014) 8 SCC 273 मामले में सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों और B.N.S.S. की धारा 35(3) के प्रावधानों के अनुसार गिरफ्तारी की प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित करें।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 35(3) के अनुसार, 7 वर्ष तक की सजा वाले मामलों में तुरंत गिरफ्तारी करना अनिवार्य नहीं है, बल्कि पुलिस अधिकारी को पहले आरोपी को पेशी का लिखित नोटिस देना होता है। पुलिस अधिकारी तो बिना हाईकोर्ट के आदेश/निर्देश के ही किसी भी मामले में जिसमें 7 वर्ष से कम की सजा रहती है, उसमें आरोपी को गिरफ्तार नहीं करती। यदि किसी प्रकरण में गिरफ्तार करती है तो उसमें सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए ही गिरफ्तारी करती है। फिर भी धोखाधड़ी एवं जालसाजी के आरोपी जितेन्द्र कुमार अग्रवाल डर वश हाईकोर्ट इलाहबाद में गिरफ्तारी से बचने के लिए रिट दाखिल किया था।
जनपद प्रतापगढ़ में भाजपा ब्यापार प्रकोष्ठ के जिला संयोजक सुनील कुमार गोयल और उनके सहयोगी जीतेंद्र अग्रवाल पर भारतीय को-ऑपरेटिव ग्रामीण विकास एवं निर्माण लिमिटेड द्वारा संचालित विधान मंडल क्षेत्र विकास निधि योजना के अंतर्गत स्वीकृत शासकीय धनराशि के गबन, धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात, जालसाजी एवं अन्य संज्ञेय अपराधों के संबंध में कानपुर देहात के थाना अकबरपुर में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज हुई थी। उक्त अपराध आरोपियों ने साल-2015 से साल-2018 के बीच किया है, लिहाजा मुकदमा आईपीसी की धारा-406 के तहत दर्ज किया गया है। जबकि तहरीर के मुताविक FIR में और धाराएं लगनी थे, जो प्रथम सूचना रिपोर्ट लिखते समय नहीं लगी।
यक्ष प्रश्न यह है कि 10 साल पहले आरोपियों द्वारा शासकीय धनराशि का गबन, धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात, जालसाजी, कूटरचित अभिलेखों का उपयोग तथा अन्य गंभीर संज्ञेय अपराध कारित करने के बाद भी उनके खिलाफ मुकदमा लिखाने में इतना लम्बा वक्त लग गया, जबकि आरोपियों ने सरकारी धन के हजम करने के साथ-साथ संस्था के कोष को भी भारी आर्थिक क्षति पहुँचाई है। अभी तो सिर्फ एक जनपद कानपुर देहात का मामला प्रकाश में आया है। सूत्र बताते हैं कि सुनील कुमार गोयल और उनके रिश्तेदार जीतेंद्र कुमार अग्रवाल द्वारा अन्य जनपदों में भी बड़े पैमाने पर खेला किया गया है।
मजेदार बात यह है कि सुनील कुमार गोयल कोतवाली नगर प्रतापगढ़ के भदरी हाउस के निवासी हैं और भारतीय को-ऑपरेटिव ग्रामीण विकास एवं निर्माण लिमिटेड के प्रबंध निदेशक विजय कुमार के सगे भाई हैं। उक्त मुकदमा विजय कुमार गोयल बतौर प्रबंध निदेशक, भारतीय को-ऑपरेटिव ग्रामीण विकास एवं निर्माण लिमिटेड ने दर्ज कराई है। जीतेंद्र अग्रवाल, सुनील कुमार गोयल के रिश्तेदार हैं और उनके प्रतापगढ़ गोयल फर्नीचर वाली शोरूम पर नौकरी करते हैं। जीतेंद्र अग्रवाल उर्फ़ जीतू सुनील कुमार गोयल के हर ब्यवसाय में शामिल रहते हैं। अब ब्यवसाय चाहे वैध हो अथवा अवैध हो, परन्तु सुनील कुमार गोयल अपने साथ में जीतेंद्र कुमार अग्रवाल को शामिल किये रहते हैं।
भारतीय को-ऑपरेटिव ग्रामीण विकास एवं निर्माण लिमिटेड के प्रबंध निदेशक विजय कुमार पुत्र स्व0 केदारनाथ, निवासी 202/9, ए.पी. सेन रोड, नील रंग, लालबाग, लखनऊ-226001, प्रबंध निदेशक, भारतीय को-ऑपरेटिव ग्रामीण विकास एवं निर्माण लिमिटेड, स्थित 9, प्रथम तल, नटराज कम्प्लेक्स, 11 बी.एन. रोड, लालबाग, लखनऊ, सविनय निवेदन करता है कि भारतीय को-ऑपरेटिव ग्रामीण विकास एवं निर्माण लिमिटेड एक बहुराज्यीय सहकारी समिति है, जो बहुराज्यीय सहकारी समितियां अधिनियम, 2002 के अंतर्गत पंजीकृत है। सहकारिता मंत्रालय, भारत सरकार की आधिकारिक रिपोर्ट दिनांक- 11.04.2025 में भी संस्था की अधिकृत संगठनात्मक संरचना का उल्लेख किया गया है।
उत्तर प्रदेश शासन द्वारा संस्था की विधान मंडल क्षेत्र विकास निधि योजना के अंतर्गत जनपद कानपुर देहाल (माती) में विभिन्न निर्माण कार्यों हेतु शासकीय धनराशि स्वीकृत की गई थी, जिसे बैंक ऑफ बड़ौदा, शाखा माती, जनपद कानपुर देहात स्थित खाता संख्या- 30700100009127 में जमा कराया गया। उक्त निर्माण कार्यों के निष्पादन एवं निधियों के उपयोग का उत्तरदायित्व संस्था के तत्कालीन महाप्रबंधक (प्रशासन) सुनील कुमार गोयल तथा तत्कालीन अध्यक्ष जितेन्द्र कुमार अग्रवाल को सौंपा गया था। संस्था बनाकर सरकारी धन को हजम करने का ये खेल काफी पुराना है, जो आज भी बदस्तूर जारी है।
वर्ष- 2015 से वर्ष- 2018 के मध्य दोनों ने आपराधिक षडयंत्र के तहत मिलीभगत कर उक्त खाते से लगभग 6,32,25,000/- (छः करोड़, बत्तीस लाख, पच्चीस हजार रूपये) की अवैध निकासी की तथा धनराशि को अपने निजी हित में एवं विभिन्न निजी संस्थाओं/फर्मों के माध्यम से स्थानांतरित कर गबन किया। इसके अतिरिक्त उक्त बैंक खाते से लगभग 94,03,700/- (चौरानवे लाख, तीन हजार, सात सौ रूपये) की धनराशि भी अनियमित एवं संदेहास्पद रूप से निकाली गई, जिसके संबंध में न तो संस्था की कोई स्वीकृति प्राप्त की गई, न ही किसी सक्षम प्राधिकारी द्वारा कोई अनुमोदन दिया गया और न ही किसी प्रकार की निविदा प्रक्रिया अथवा वैधानिक प्रक्रिया का पालन किया गया।
समस्त निकासी पूर्णतः धोखाधड़ी, कूटरचना एवं आपराधिक विश्वासघात का परिणाम है तथा इन धन राशियों के वास्तविक उपयोग का कोई अभिलेख उपलब्ध नहीं है। शासन द्वारा समय-समय पर विभिन्न पत्रों के माध्यम से निर्माण कार्यों एवं धनराशि के उपयोग के संबंध में जानकारी एवं स्पष्टीकरण मांगा जाता रहा, किन्तु आरोपियों द्वारा तथ्य छिपाए गए तथा शासन को भ्रामक एवं असत्य जानकारी प्रदान की गई। अपनी अनियमितताओं को छिपाने के उद्देश्य से आरोपियों ने संस्था के बैंक खाते को भी बिना किसी विधिक अधिकार के अन्यत्र स्थानांतरित कर दिया, जिससे वित्तीय नियंत्रण एवं अभिलेखीय परीक्षण प्रभावित हुआ।
संस्था द्वारा अनेक अवसरों पर स्पष्टीकरण मांगने, नोटिस जारी करने एवं धनराशि का लेखा-जोखा प्रस्तुत करने का अवसर दिए जाने के बावजूद आरोपियों ने न तो गबन की गई राशि लौटाई और न ही कोई वास्तविक बिल, वाउचर अथवा उपयोगिता प्रमाण प्रस्तुत किया। फलस्वरूप संस्था द्वारा सुनील कुमार गोयल को सेवा से पृथक भी कर दिया गया। उपर्युक्त समस्त कृत्यों से स्पष्ट है कि आरोपियों ने शासकीय धनराशि का गबन, धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात, जालसाजी, कूटरचित अभिलेखों का उपयोग तथा अन्य गंभीर संज्ञेय अपराध कारित किए हैं, जिससे न केवल संस्था बल्कि राज्यकोष को भी भारी आर्थिक क्षति हुई है तथा आरोपियों ने स्वयं अवैध आर्थिक लाभ अर्जित किया है।
