नौकरशाही को भी भाती है, राजनीतिक चमक-दमक, लोकसभा चुनाव में कई पूर्व अफसर हैं, दावेदार

नई दिल्ली। नौकरशाहों के राजनीतिक रुझान की चर्चाएं अक्सर होती रहती हैं और रिटायरमेंट के बाद कई अधिकारी राजनीतिक पार्टियों में न सिर्फ शामिल हुए बल्कि चुनाव भी लड़े और मंत्री भी बने। लेकिन सरकारी सेवा में रहते ही यदि कोई अधिकारी स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति लेकर राजनीतिक पार्टी में शामिल होकर चुनाव लड़ने की तैयारी करने लगे तो सेवा के दौरान उसकी निरपेक्षता पर संदेह होना स्वाभाविक है। खासकर तब, जब अधिकारी रिटायरमेंट लेकर सत्तारूढ़ दल में शामिल हो जाए। हालांकि ऐसे भी कई उदाहरण हैं, जब राजनीति में आने की इच्छा से लोगों ने नौकरशाही से इस्तीफा दे दिया, लेकिन राजनीति में उन्हें कुछ मिला भी नहीं।

अफसरी छोड़कर मंत्री बनने की मिसालें

ताजातरीन उदाहरण बिहार के डीजीपी रहे गुप्तेश्वर पांडेय का है जिन्होंने डीजीपी जैसे शीर्ष पद से इस उम्मीद में इस्तीफा दे दिया कि नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड उन्हें टिकट दे देगी और वे चुनाव जीतकर विधानसभा में पहुंच जाएंगे। लेकिन जदयू ने न तो उन्हें टिकट दिया, न ही विधानपरिषद या राज्यसभा भेजा और न ही पार्टी में कोई तवज्जो दी। गुप्तेश्वर पांडेय अब जगह-जगह घूमकर भागवत कथा सुना रहे हैं। केंद्र से लेकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में नौकरशाही के रुझान में बढ़ोतरी होती ही जा रही है।

छत्तीसगढ़ के पूर्व सीएम अजित जोगी भी नौकरशाही की उपज रहे 

कांग्रेस की सरकार में भी उन अफसरों को राजनीति में लाकर उन्हें नेता बनाया और मुख्यमंत्री तक बनाया। कुछ अफसरों में नेतागीरी के गुण विद्यमान होते हैं और सत्ताधारी दल उन पर नजर रखते हैं और उन्हें राजनीति में आने के लिए प्रेरित करते हैं।  नौकरशाही को भी राजनीतिक चमक-दमक भाती है। बीते 24 सालों में राजनीति में आने वाले ब्यूरोक्रेट्स की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हुई है। सेना और इंजीनियरिंग संवर्ग के अधिकारी भी अपनी दूसरी पारी के लिए राजनीति को ही प्राथमिकता दे रहे हैं। इस बार लोकसभा चुनाव में भी कई पूर्व अफसर मैदान में है। नौकरशाही के सारे हुनर के माहिर अफसर राजनीति के दांव-पेच भी खूब जानते हैं।

भारतीय विदेश सेवा के अफसर भी राजनीति के मैदान में उतरे और महत्वपूर्ण पदों पर पहुँचे

भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी नटवर सिंह, पूर्व सैन्य अधिकारी जसवंत सिंह जैसे कुछ चेहरे हैं जो राजनीति में बड़े ओहदों तक पहुंचे। उत्तर प्रदेश की बात की जाए तो ओपी सागर, राय सिंह, चंद्र प्रकाश, देवी दयाल, ओपी राम, आर ए प्रसाद समेत पूर्व नौकरशाहों की लंबी लिस्ट है, जो राजनीति में आए। इसके बाद नौकरशाही छोड़कर राजनीति में आने का सिलसिला चल निकला। राजनीति में आने के लिए उन्हें वीआरएस लेने से भी कोई गुरेज नहीं है। लोकसभा चुनाव की बात अगर की जाए तो इस बार भी कई पूर्व नौकरशाह चुनाव लड़ने के लिए कोशिश करते हुए नजर आ रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कैबिनेट सेक्रेटरी रहे नृपेंद्र मिश्रा के बेटे साकेत मिश्रा भाजपा से श्रावस्ती से चुनावी मैदान में हैं।

फैजाबाद से पूर्व आईपीएस अरविंद सेन भाकपा से चुनावी मैदान में उतरने जा रहे हैं। डिप्टी एसपी रहे शुभ नरायन गौतम को बसपा ने कौशांबी से चुनावी मैदान में उतारा है। ए के शर्मा भी वीआरएस लेकर भाजपा में शामिल हुए और आज यूपी में मंत्री हैं। बसपा ने इस बार रिटायर्ड आईआरएस अधिकारी सुरेंद्र सिंह को मथुरा से चुनावी मैदान में उतारा है। इंजीनियरिंग संवर्ग के रिटायर्ड अफसर सुरेश गौतम को जालौन से चुनावी मैदान में उतारा है। सपा ने रिटायर्ड एडीजे मनोज कुमार को नगीना से चुनावी मैदान में उतारा है। नोएडा के पूर्व डीएम बीएन सिंह ने तो नौकरी में रहते राजनीति में पैठ जमानी शुरू कर दी थी, लेकिन चुनावी मैदान में नहीं उतर पाए। बिहार और झारखंड सहित छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र एवं मध्यप्रदेश के अफसर भी अछोते नहीं रहे।

मोदी कैबिनेट में भी कई अफसर शामिल हुए और महत्वपूर्व मंत्रालय जैसे विदेश मंत्री और रेल मंत्री की जिम्मेदारियों का कर हैं, निर्वहन   

नौकरशाही के सारी विद्या में माहिर अफसर राजनीति के दांव-पेच भी खूब जानते हैं। मौका पड़ने पर राजनेताओं की तरह वह पाला बदलने से नहीं चूकते। बसपा सरकार में सबसे कद्दावर अफसरों में शुमार आईएएस कुंवर फतेह बहादुर सिंह और रामबहादुर ने सेवानिवृत्ति के बाद बसपा का दामन थाम लिया था। फतेह बहादुर बाद में सपा का दामन लिया तो रामबहादुर ने भाजपा का दामन लिया। अफसर तो अफसर होते हैं, उन्हें सारे दांव पेंच पता होते हैं। बसपा मुखिया मायावती के करीबी अफसरों में रहे पीएल पुनिया ने कांग्रेस से राजनीति करने का फैसला लिया। बाद में ताज कारीडोर घोटाले में बचने के लिए कांग्रेस में शामिल हो गए।

पूर्व आईएएस अफसर नीरा यादव के पति पूर्व आईपीएस महेंद्र सिंह यादव सपा सरकार में मंत्री बने, लेकिन बाद में उन्होंने भाजपा में जाने का फैसला कर लिया। नौकरशाही में मलाई काटकर जो अफसर राजनीति के रुतवे को जान जाए, फिर उससे वह अछूता कैसे रह सकता है ? भाजपा में सबसे अधिक रिटायर्ड अफसर हैं। जनरल वीके सिंह ने गाजियाबाद से चुनाव लड़ा और केंद्र सरकार में मंत्री बने, लेकिन इस बार वीके सिंह ने चुनाव लड़ने से मना कर दिया है। मुंबई के पुलिस कमिश्नर रहे सत्यपाल सिंह भी भाजपा के टिकट पर बागपत से सांसद बनने के बाद केंद्र सरकार में मंत्री बने। गुजरात काडर के आईएएस अफसर रहे एके शर्मा को यूपी सरकार में मंत्री बनाया गया।

नौकरशाही और बीजेपी का पुराना प्रेम

कानपुर के पुलिस कमिश्नर रहे असीम अरुण ने वीआरएस लेकर चुनाव जीतकर यूपी सरकार में मंत्री बने। पूर्व डीजीपी बृजलाल ने चुनावी मैदान तो नहीं उतारे, लेकिन भाजपा ने उन्हें राज्यसभा भेज दिया। आईएएस अफसर रहे हरदीप सिंह पुरी को भी यूपी से राज्यसभा भेजा गया। भारतीय रेल सेवा के अफसर रहे देवमणि दुबे भाजपा से सुल्तानपुर की लंभुआ सीट से विधायक रह चुके हैं। ईडी के ज्वाॅइंट डायरेक्टर रहे राजेश्वर सिंह ने वीआरएस लेकर भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और विधायक बनने में सफल रहे। इसमें कोई संशय नहीं कि नौकरशाही से निकले नेता सफल नहीं हुए। वर्तमान में मोदी सरकार में विदेश मंत्री डॉ जय शंकर और रेल मंत्री अश्वनी वैष्णव बेहतर कार्य के लिए देश भर में अपना स्थान बनाने में सफलता अर्जित किये हैं।

नौकरशाहों से बीजेपी का प्रेम काफी पुराना है और जनसंघ के जमाने से ही चला आ रहा है। साल- 1967 में फैजाबाद के डीएम रहे के के नायर जनसंघ के टिकट पर बहराइच से लोकसभा पहुंचे थे। यूपी के डीजीपी रहे श्रीशचंद्र दीक्षित पहले बीजेपी में आए और बाद में विश्व हिन्दू परिषद में चले गए और राममंदिर आंदोलन में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वीएचपी नेता अशोक सिंघल के भाई बीपी सिंघल, यूपी के डीजीपी रहे ब्रजलाल, यशवंत सिन्हा, विदेश मंत्री एस जयशंकर, रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव जैसे तमाम अधिकारी इस सूची में शामिल हैं।

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