सनातन विरोधी दलबदलू व बहुरुपिया स्वामी प्रसाद मौर्य की राजनीतिक चार धाम यात्रा

लखनऊ। राजनीति में न कोई सिद्धांत रह गया है और न ही राजनेताओं का चरित्र ही रह गया है। सुबह किसी दल में तो शाम को किसी दल में पहुँच जाते हैं। ऐसे ही एक घटिया किस्म का नेता है, स्वामी प्रसाद मौर्या। इन्होंने बसपा से राजनीति का प्रारंभ करके भाजपा, सपा में डुबकी लगा आये हैं।
कुछ दिन पहले कांग्रेस के दरबार में पहुंचकर इंडी गठबंधन का हिस्सा बनना चाहते थे, परन्तु कांग्रेस ने दो टूक में बता दिया कि कांग्रेस में शामिल हो सकते हो ! इंडी गठबंधन का हिस्सा बनने की औकात तुम्हारे में नहीं है। स्वामी प्रसाद मौर्य अपनी डूबती नैया को बचाने के लिए अब वेचैन हैं, उन्हें कांग्रेस की हर शर्त मंजूर है।
स्वामी प्रसाद मौर्या का पहला धाम था, बसपा। कांशीराम जी और मायावती जी की छाया में इन्होंने अपनी राजनीति सीखी। पहचान बनाई। बड़ा ओबीसी नेता कहलाए। बसपा ने इन्हें नेता बनाया। मंत्री बनाया। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तक बनाया। फिर भी मौकापरस्त स्वामी प्रसाद मौर्या मौका मिलते ही बसपा की हाथी की सवारी से उतर कर दूसरे धाम पहुँचने के लिए कमल का फूल पर सवार हो गये।
दूसरा धाम था, भाजपा। साल- 2016 में बसपा छोड़कर भाजपा में आए तो भाजपा ने इन्हें वो दिया, जिसकी इन्होंने कल्पना भी नहीं की थी। योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री। बड़ा कद। बड़ी जिम्मेदारी। मगर वहीं रहते हुए भाजपा के ही संस्कारों की तेरहवीं करने की बातें शुरू कर दीं।
तीसरा धाम समाजवादी पार्टी। भाजपा से नाराज होकर सपा में गए। सोचा यहाँ बेटी के साथ-साथ बेटे का भी भविष्य बन जाएगा। अखिलेश यादव ने पूरा सम्मान दिया। एमएलसी बनाया। पार्टी में बड़ा चेहरा बनाया। मगर वहाँ भी वही कहानी- सनातन धर्म का विरोध। रामचरितमानस को लेकर विवादित बयान। हिंदू देवी-देवताओं पर अभद्र टिप्पणियां। सनातन धर्म को दिन रात गाली देने वाले स्वामी प्रसाद मौर्या दिन रात पिछड़े वर्ग के हक की बात करते हैं, उसी वर्ग के आराध्य पर चोट।
चौथा धाम- कांग्रेस। सपा से भी मन नहीं भरा तो अब कांग्रेस का हाथ थाम लिया। चार पार्टियां घूम लीं, मगर जनता का भरोसा कहीं नहीं मिला। हर जगह गए, हर जगह से खुद ही निकले, या निकाले गए। अब सबसे बड़ा सवाल इस परिवारवाद की नौटंकी पर है। पिता स्वामी प्रसाद मौर्य दिन-रात भाजपा को गाली देते हैं। भाजपा की तेरहवीं और श्राद्ध की बात करते हैं। हिंदुत्व को खत्म करने की कसमें खाते हैं और दूसरी तरफ इनकी बेटी संघमित्रा मौर्य उसी भाजपा में हैं। उसी भाजपा के टिकट पर बंदायू से सांसद निर्वाचित हुई थी, उसी भाजपा की नीतियों का गुणगान करती हैं।
आखिर ये रिश्ता क्या कहलाता है ? ये राजनीति है या बीमा पॉलिसी ? मतलब साफ है- अगर पिता की दुकान इधर बंद हो जाए तो बेटी की दुकान उधर चलती रहे। कभी कोई मुसीबत पड़े, कोई जांच हो, कोई केस हो, तो परिवार का एक पैर हमेशा सत्ता में रहे। इसे ही कहते हैं, नेवला प्रसाद राजनीति- बिल में एक रास्ता बंद हो तो दूसरा खुला रहे।
ये दोगला चरित्र आता कहाँ से है ? कभी सनातन का विरोध, कभी हिंदू धर्मग्रंथों का अपमान। अरे जिस सनातन ने आपको बनाया, उसी को गाली दोगे ? ये विचारधारा नहीं, ये अवसरवाद है। जब तक कुर्सी मिल रही है, तब तक जय श्रीराम, कुर्सी गई तो रामचरितमानस खराब।
दरअसल स्वामी प्रसाद मौर्य जी की राजनीति का एक ही मंत्र है- जहाँ सत्ता दिखे, वहीं झंडा गाड़ दो। विचारधारा, सिद्धांत, समाज- सब बाद में। पहले खुद का और परिवार का भविष्य सुरक्षित। चार धाम घूम आए, मगर मन को शांति नहीं मिली, क्योंकि जनता अब सब समझती है। अब इस चार धाम यात्रा का प्रसाद जनता नहीं ले रही। धन्य हैं, इन जैसे नेताओ के समर्थक जो बाबूजी कहकर बुलाते है, इन्हे।