प्रतापगढ़ संसदीय क्षेत्र के सपा उम्मीदवार पूर्व एमएलसी बहुचर्चित सीपी सिंह हत्याकांड में जा चुके हैं, जेल 

बहुचर्चित सीपी सिंह हत्याकांड में पुलिस से हुई कई जगहों पर चूक, जिसकी वजह से केस में नहीं हो पाई सजा, बहुचर्चित सीपी सिंह हत्याकांड में परिजनों को आज तक नहीं मिला न्याय, आखिर हत्यारा कौन ? कौन कराया था, भाड़े के शूटरों से हत्या ? हत्या में इस्तेमाल हुई पिस्टल भी पुलिस ने की थी, बरामद…!!!

  • हाईलाईटेड 

  • पुलिस गवाहों को होस्टाइल करने से नहीं बचा सकी। मुख्य गवाह मुन्ना कटियार ने कलमबंद बयान दिया था। बाद में कोर्ट में वह अपने बयान से मुकर गया

  • घटना के चश्मदीद गवाह सत्येंद्र को बाद में आरोपियों के एक स्कूल में गेट कीपर की नौकरी मिल गई। लिहाजा उसने पुलिस का साथ छोड़ दिया।

  • स्कूल की तत्कालीन प्रिंसिपल ने भी पुलिस का साथ नहीं दिया। वह आरोपियों के पक्ष में भी नहीं थीं। उन्होंने नौकरी ही छोड़ दी।

  • शूटर, साजिशकर्ता और मुख्य आरोपी के बीच हुई बातचीत के ब्यौरे को पुलिस साक्ष्य के रूप में सही ढंग से कोर्ट में पेश नहीं कर पाई।

  • वारदात के बाद सीपी सिंह के भाई वीरेंद्र कुमार ने अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई। नामजद एफआईआर होती, तो विवेचना में बल मिलता।

  • शूटरों की निशानदेही पर बरामद पिस्तौल को भी पुलिस सही साबित नहीं कर पाई। लिहाजा आरोपी आर्म्स एक्ट के मुकदमे से भी बरी हो गए।

देखने में सीधे-साधे, पर अंदर से हैं शातिर हैं सपा प्रत्याशी डॉ एसपी सिंह पटेल

साल- 2006 में हुई थी, लखनऊ पब्लिक स्कूल (एलपीएस) के संस्थापक सदस्य सीपी सिंह की हत्या

लखनऊ। राजधानी के बहुचर्चित सीपी सिंह उर्फ चंद्रभान सिंह हत्याकांड में प्रतापगढ़ संसदीय क्षेत्र के सपा उम्मीदवार पूर्व एमएलसी बहुचर्चित सीपी सिंह हत्याकांड में जेल की हवा खा चुके हैं। राजधानी लखनऊ के आशियाना इलाके के सेक्टर-आई में लखनऊ पब्लिक स्कूल के प्रबंधक सीपी सिंह की मोटरसाइकिल सवार अज्ञात बदमाशों ने 21 सितंबर, 2006 की सुबह दस बजे गोली मारकर हत्या कर दी थी। दिन-दहाड़े हुई हत्या की प्राथमिकी मृतक के भाई वीरेंद्र कुमार सिंह ने अज्ञात बदमाशों के खिलाफ दर्ज कराई थी। जांच के दौरान हत्या के इस मामले में तत्कालीन सपा एमएलसी डॉ एसपी सिंह समेत अन्य तीनों मुल्जिमों का नाम सामने आया था।

कॉलेज के बाहर बाइक सवार दो अज्ञात बदमाशों ने सीपी सिंह पर ताबड़तोड़ चलाई थी, गोलियां 

अदालत ने इस मामले के तीन अन्य मुल्जिम शिव बहादुर उर्फ शिवा सचान, रणबीर सिंह उर्फ नीलू और आनंद कुमार उर्फ अनंत वर्मा को भी सबूत के अभाव में बरी होने का आदेश दे दिया। सीपी सिंह हत्याकांड में रणबीर और आनंद पर हत्या का केस दर्ज है। वहीं, शिव बहादुर पर हत्या के साथ ही हत्या की साजिश रचने का भी आरोप था। विशेष जज विनोद कुमार ने मुल्जिम रणबीर को आर्म्स एक्ट के आरोप से भी बरी कर दिया था। बताते चलें कि आशियाना के सेक्टर-आई में 21 सितंबर, 2006 की सुबह सीपी सिंह की हत्या कर दी गई थी। वह लखनऊ पब्लिक स्कूल के प्रबंधक थे। कॉलेज के बाहर बाइक सवार दो अज्ञात बदमाशों ने उन पर ताबड़तोड़ गोलियां चलाई थी।

स्कूल संचालन की प्रतिस्पर्धा में हुई थी, सीपी सिंह की हत्या

मालुम हुआ कि स्कूल संचालन की प्रतिस्पर्धा में सीपी सिंह हत्या कराई गई। मृतक सीपी सिंह और हत्यारोपी डॉ एसपी सिंह पहले लखनऊ पब्लिक स्कूल के पार्टनर थे। लेकिन विवाद के चलते बाद में अलग हो गए। स्कूल का भी बटवारा हो गया। जबकि स्कूल का नाम एक ही रहा। जांच में सामने आया कि डॉ एसपी सिंह ने इस हत्या की साजिश रची थी। इसके लिए मुल्जिम शिवबहादुर के जरिए शूटर रणबीर व अंनत को हायर किया गया। दोनों को दस लाख की सुपारी दी गई थी। सोमवार को राजधानी की एक विशेष अदालत ने अपना फैसला सुनाया था। इसमें पूर्व एमएलसी डॉ एस पी सिंह उर्फ शिवपाल सिंह को कोर्ट ने साक्ष्य के अभाव में बाइज्जत बरी कर दिया। क्योंकि घटना के सभी गवाह कोर्ट में बयान के समय अपने पूर्व में दिए गए बयान से मुकर गए थे।

साक्ष्य के अभाव में बहुचर्चित सीपी सिंह हत्याकांड के सभी आरोपियों को कोर्ट ने करीब छः साल बाद कर दिया, बरी 

राजधानी के बहुचर्चित सी पी सिंह हत्याकांड के सभी आरोपियों को कोर्ट ने करीब छः साल बाद बरी कर दिया। इस हत्याकांड में आरोपी क्यों बरी हो गए ? पुलिस की विवेचना में कहां-कहां चूक हुई ?  खुलासा इंडिया की टीम ने इस पर गहराई से पड़ताल की। छानबीन में सामने आया कि कोर्ट में मुख्य गवाह के अपने बयान से पलट जाने से यह केस कमजोर हुआ। कई गवाह ट्रायल के दौरान बैकफुट पर आ गए। पुलिस ने भी केस की विवेचना में कई जगह चूक की। यही वजह थी कि कोर्ट का फैसला आरोपियों के पक्ष में आया। इससे सीपी सिंह हत्याकांड के रहस्य से पर्दा नहीं उठ सका।

पुलिस की जांच में सामने आया था, डॉ एसपी सिंह का नाम

आशियाना थाने के तत्कालीन एसओ ने मामले की विवेचना शुरू की थी। जांच में तत्कालीन एमएलसी एस पी सिंह समेत अन्य तीन मुल्जिमों का नाम सामने आया था। सीपी सिंह और एसपी सिंह पहले लखनऊ पब्लिक स्कूल के पार्टनर थे। बाद में विवाद के चलते दोनों अलग हो गए थे। पुलिस ने दावा किया था कि डॉ एसपी सिंह ने ही इस हत्याकांड की साजिश रची थी। उसने अपने करीबी शिव बहादुर के जरिए शुटर रणवीर और अनंत को सीपी सिंह की हत्या की सुपारी दी थी। उसने इसके लिए दोनों को दस लाख रुपए भी दिए थे। सीपी सिंह के भाई वीरेंद्र कुमार सिंह ने इस मामले में अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई थी। पुलिस ने तफ्तीश के दौरान कई सबूत जुटाए थे। साथ ही कई लोगों को गवाह भी बनाया था।

चारों आरोपियों पर लगे थे, गैंगेस्टर एक्ट

इसके बाद पुलिस ने तत्कालीन एमएलसी एसपी सिंह व शिव बहादुर उर्फ शिवा को सीपी सिंह हत्याकांड की साजिश रचने के आरोप में 27 दिसंबर, 2006 को गिरफ्तार किया। तफ्तीश पूरी करके पुलिस ने आरोपपत्र दाखिल किया और चारों पर गैंगेस्टर एक्ट के तहत कार्रवाई की गई। एसपी सिंह को 8 मार्च, 2007 को हाईकोर्ट से जमानत मिल गई। इसके खिलाफ सीपी सिंह के परिवारीजनों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। जमानत खारिज होने पर डॉ एसपी सिंह ने 21 अक्तूबर, 2008 को कोर्ट में आत्मसमर्पण कर दिया था। अपर सत्र न्यायाधीश विनोद कुमार ने पत्रावली के अवलोकन, गवाहों के बयान और 19 जुलाई को दोनों पक्षों के वकीलों की बहस सुनने के बाद फैसला सोमवार के लिए सुरक्षित रख लिया था। इस मुकदमे में अभियोजन ने 16 और बचाव पक्ष की ओर से चार गवाह पेश किए गए थे। मामले की तह तक जाने के लिए कोर्ट ने पांच गवाहों को अपने स्तर से बुलाया था।

 

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