आखिरकार घटिया राजनीति मानवीय संवेदना पर भारी पड़ गई

भाई की तेरहवीं में अखिलेश यादव ने दिखाया सौतेलापन, सनातन परम्परा का नहीं किया निर्वहन…
मुलायम परिवार का एक भी ब्यक्ति उनके घोषित पुत्र के श्राद्ध कर्मकांड एवं तेरहवीं की परंपरा का निर्वहन नहीं किया। सैफई के मुलायम सिंह यादव परिवार की तुलना देश में सबसे बड़े राजनीतिक परिवार में की जाती है। ऐसे में मुलायम के बेटे प्रतीक यादव के तेरहवीं संस्कार में परिवार के किसी सदस्य ने क्षौर कर्म की परंपरा का निर्वहन नहीं किया।
ऐसे में मुलायम सिंह के परिवार द्वारा मृतक आत्मा के तेरहवीं संस्कार और उसकी अंतिम गति की सनातनी परम्परा का निर्वहन नहीं किया। जब मुलायम सिंह यादव के परिवार वाले अपने सिर का बाल तक नहीं उतरा सके तो वो सनातन धर्म के अनुसार उनकी शुद्धता पर सवालिया निशान खड़ा हो जाता है। क्योंकि यही अखिलेश यादव अपने पिता मुलायम सिंह यादव की तेरहवीं पर सनातन धर्म की परम्परा का निर्वहन किया था।
पीएम मोदी अपनी माँ के मृत्यु उपरांत अपने सिर के बाल नहीं बनवाये थे, सो मीडिया में उनकी बहुत किरकिरी हुई थी। लोग पीएम मोदी को जमकर कोसे थे। सनातन धर्म के ध्वजावाहक और सनातन धर्म के ठेकेदारों के चाल चेहरे और चरित्र देखकर इनके प्रति घृणा ही बढ़ती है। क्योंकि इनके हर कार्य में दिखावा होता है। राजनीतिक नफा नुकसान की खातिर कुछ भी करने को जो तैयार हो, शायद उसे ही नेता मानना बेहतर होगा।
जब अखिलेश यादव कथित सनातनी अपने सौतेले भाई के मृत्यु के उपरांत पोस्टमार्टम हाउस और लखनऊ स्थित प्रतीक यादव के आवास पहुँचे थे तो लाल टोपी पहने थे। उस समय अखिलेश यादव को सोशल मीडिया पर बहुत कुछ सुनाया गया था। लोगों ने सोचा कि इतना सुनने के बाद अब 13वीं में तो अखिलेश यादव अपनी लाल टोपी उतार कर ही आयेंगे। परन्तु दुर्भाग्य वश ऐसा नहीं हुआ।
श्राद्ध में सिर का बाल न उतरवाना और तेरहवीं में पुनः लाल टोपी पहनकर तेरहवीं का भोज खाते देख बहुतों का मन अखिलेश यादव के प्रति खिन्न हो गया। क्योंकि यही अखिलेश यादव जब मुकेश अंबानी के बेटे की शादी में शामिल हुए तो बगैर लाल टोपी के दिखे थे। इनकी लाल टोपी कोई इलाके में पहनी जाने वाली टोपी नहीं है, बल्कि विशुद्ध रूप से राजनीतिक टोपी है।
जैसे महाराष्ट्र और गुजरात के कई इलाकों में एक सफेद टोपी पहनी जाती है या राजस्थान के कई इलाकों में पगड़ी पहनी जाती है या हिमाचल प्रदेश में हिमाचली टोपी पहनी जाती है। लेकिन यह अखिलेश यादव की टोपी न तो आंचलिक टोपी है न जातीय सामुदायिक पहचान है, बल्कि विशुद्ध रूप से राजनीतिक दल की टोपी है। अब तेरहवी में भी अखिलेश यादव अपनी पार्टी का प्रचार कर रहे हैं तो ऐसी सोच पर क्या कहा जाए…???