नई दिल्ली। AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा ने बांग्लादेश के छात्र संगठन Socialist Students Front के छठे राष्ट्रीय सम्मेलन के लिए वीडियो संदेश में बांग्लादेश के Gen Z आंदोलन की सराहना की। नेहा बोरा ने कहा कि भारत में युवाओं के बीच चल रहे Gen Z आंदोलन को बांग्लादेश के आंदोलन से प्रेरणा मिली है।
AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष और Gen Z/CJP विरोध प्रदर्शनों की चर्चित चेहरा नेहा बोरा (जो राहुल गांधी के साथ भी नजर आ चुकी हैं) ने बांग्लादेश के सोशलिस्ट स्टूडेंट फ्रंट को वीडियो मैसेज में कहा कि भारत में जो Gen Z आंदोलन चल रहा है, वह बांग्लादेश से शुरू हुआ और उन्होंने हमें रास्ता दिखाया।
उन्होंने छात्र आंदोलनों से सीखने और लोकतंत्र एवं मतदान के अधिकारों के लिए संघर्ष में एकजुटता पर जोर दिया। उनके इस बयान ने भारत और बांग्लादेश के छात्र आंदोलनों के संबंधों को लेकर चर्चा छेड़ दी है। नेहा बोरा ने आंदोलन के मंच से बांग्लादेश का संदर्भ खींचकर न सिर्फ विशुद्ध पॉलिटिकल सुसाइड कर लिया, बल्कि सड़क पर हक की लड़ाई लड़ रहे समूचे आंदोलन की हवा निकाल दी।
इस आंदोलन ने सामने वाले पाले को बैठे-बिठाए ऐसा मुद्दा प्लेट में सजाकर थमा दिया गया है कि अब जनता के बुनियादी सवालों पर नहीं, बल्कि हफ्तों तक विदेशी मॉडल और चरमपंथ पर डिबेट चलेगी। कन्हैया कुमार आज तक उस विवाद की कालिख से पूरी तरह उबर नहीं पाए जो नारे उन्होंने कभी लगाए ही नहीं थे और यहाँ खुले मंच से ढाका के अराजक हुड़दंग को क्रांति की प्रेरणा बताकर पूरे नैरेटिव का बंटाधार कर दिया गया।
मास्को, बीजिंग और अब ढाका ?
भारतीय वामपंथ की बुनियादी त्रासदी ही यही रही है कि उसकी वैचारिक जड़ें कभी अपनी मिट्टी में गहरी धँसी ही नहीं। कल तक जिनका वैचारिक तीर्थ कभी मास्को और कभी बीजिंग हुआ करता था, क्या अब वे प्रेरणा तलाशने ढाका की गलियों में जाएंगे ?
जिस बांग्लादेश की अवाम ने तख्तापलट के बाद खुद उन जाहिलों और चरमपंथियों को किनारे लगा दिया, उस उन्मादी भीड़ को भारत के लोकतांत्रिक और संवैधानिक आंदोलन का रोल-मॉडल बनाना वैचारिक दिवालियापन नहीं तो और क्या है ?
गांधी और आंबेडकर का देश, माओ की प्रयोगशाला नहीं
तख्तापलट का रूमानी बुखार कभी उस व्यापक सामाजिक वैधता को जन्म नहीं दे सकता, जो भारत के स्वतंत्रता संग्राम, लोकतांत्रिक चेतना और सामाजिक न्याय के संघर्षों से पैदा हुई है। नक्सलबाड़ी और तेलंगाना जैसे आंदोलनों ने इतिहास में हलचल ज़रूर पैदा की, लेकिन वे कभी आम भारतीय जनमानस की स्थायी चेतना का हिस्सा नहीं बन सके।
वजह साफ थी—माओ की हिंसक लाल-क्रांति कभी महात्मा गांधी की जन-स्वीकृति और बाबा साहेब आंबेडकर के संवैधानिक सामाजिक न्याय का विकल्प नहीं बन सकती। भारत कोई ताश के पत्तों का महल नहीं है जिसे विदेशी तख्तापलट की हवा देकर गिरा दिया जाए।
हिंदुस्तान की लोकतांत्रिक चेतना, उसकी जातिगत-धार्मिक संरचना और संविधान की जड़ें बहुत गहरी हैं। जो लोग विदेशी तख्तापलट का चश्मा पहनकर यहाँ बदलाव का भ्रम पालते हैं, वे असल में बदलाव के दुश्मन साबित होते हैं। हक की लड़ाई तिरंगे और संविधान की छांव में लड़ी जाती है, सीमाओं के पार बैठे चरमपंथियों की नज़ीर देकर नहीं।