खाद सब्सिडी को लेकर ऐतिहासिक बदलाव, पूरी प्रक्रिया हुई डिजिटल, 2.17 लाख करोड़ रुपये पार कर गया था, सब्सिडी बिल

भारत में खाद का संकट: पर्यावरण और खेती दोनों पर प्रभाव…

FY26 में 2.17 लाख करोड़ रुपये पार कर गया था, सब्सिडी बिल…

नई दिल्ली। केंद्र की मोदी सरकार हर साल खाद पर लाखों करोड़ रुपये की सब्सिडी देती है, लेकिन हैरान करने वाली बात ये है कि खेतों में डाली गई अधिकतर खाद फसलों तक पहुंचती ही नहीं है, जिससे फसल दिल खोलकर लहलहा नहीं पा रही है। विशेषज्ञों और खाद बनाने वाली कंपनियों का कहना है कि जितनी खाद खेतों में डाली जाती है, उसका करीब दो-तिहाई हिस्सा पौधों तक नहीं पहुंच पाता। यह खाद या तो जमीन के अंदर पानी में मिल जाती है, या हवा में उड़ जाती है, जिससे वातावरण को भी नुकसान होता है।

भारत में कितनी है, खाद की खपत

भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा खाद उपभोक्ता है। भारत यूरिया सबसे ज्यादा मात्रा में विदेश से मंगवाता है। मोदी सरकार ने साल 2025-26 में खाद सब्सिडी पर 2.17 लाख करोड़ रुपये खर्च किए। अगले साल 2026-27 के लिए उर्वरक मंत्रालय ने 3.54 लाख करोड़ रुपये की सब्सिडी मांगी है। देश की सबसे बड़ी सब्सिडी योजनाओं में शामिल उर्वरक यानी खाद सब्सिडी योजना में साल 2026 के पहले ही दिन खाद विभाग सरकार ने खाद सब्सिडी सिस्टम में ऐतिहासिक बदलाव कर दिया है। इस वीडियो में जानें क्या हुआ है, बदलाव।

यूरिया की नहीं होगी किल्लत

भारत को हर साल लगभग 6.77 करोड़ टन खाद की जरूरत होती है, इसमें यूरिया, डीएपी, एमओपी और एनपीके जैसी खादें शामिल हैं। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा यूरिया का है, जो लगभग 55-60 प्रतिशत खपत का होता है। हर साल लगभग 4 करोड़ टन यूरिया की मांग है और यह हर साल 5 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है।

फसलों को मिलता है, कितना पोषण

वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि पौधे यूरिया और डीएपी जैसी खादों का सिर्फ 30 से 40 प्रतिशत ही सोख पाते हैं। बाकी 60-65 प्रतिशत पोषक तत्व बेकार चले जाते हैं। दीपक फर्टिलाइजर्स कंपनी के प्रमुख एससी मेहता बताते हैं कि कुछ खाद बारिश या सिंचाई के पानी के साथ जमीन के अंदर चली जाती है और कुछ हवा में उड़कर प्रदूषण फैलाती है।एससी मेहता का कहना है,इतनी बड़ी सब्सिडी देकर सरकार को नुकसान उठाना पड़ता ही है।साथ में पर्यावरण भी बिगड़ रहा है। बता दें कि दीपक फर्टिलाइजर्स देश की सबसे बड़ी खाद बनाने वाली कंपनियों में से एक है।

पुरानी खाद बनाम नैनो खाद

इफको के प्रबंध निदेशक केजे पटेल बताते हैं कि पुरानी खादें जैसे यूरिया,डीएपी को मिट्टी में डाला जाता है,लेकिन मिट्टी की सेहत खराब होने और सही मात्रा का ध्यान न रखने की वजह से इनका काफी हिस्सा बर्बाद हो जाता है।पुरानी खादों से फसलों को सिर्फ 30-40 प्रतिशत फायदा मिलता है, जबकि नैनो खाद से 80-90 प्रतिशत तक फायदा मिलता है।इफको नैनो तकनीक वाली खादों को बढ़ावा दे रहा है,ताकि कम मात्रा में भी फसलों को अच्छा पोषण मिल सके।नैनो खाद में पोषक तत्व सीधे फसलों की जड़ों या पत्तियों तक पहुंच जाते हैं, इसलिए वे ज्यादा असरदार होते हैं।

क्या नुकसान हैं ?

जब खाद का सही से इस्तेमाल नहीं होता, तो किसानों को अपनी फसल की जरूरत के हिसाब से ज्यादा खाद डालनी पड़ती है,जिससे उनकी लागत बढ़ जाती है और सरकार पर भी सब्सिडी का भारी बोझ पड़ता है।साथ ही अतिरिक्त नाइट्रोजन जमीन में पानी के साथ मिलकर उसे प्रदूषित करती है या हवा में जाकर ग्लोबल वार्मिंग में योगदान देती है।

क्यों हो रहा है, यूरिया का ज्यादा इस्तेमाल

विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ यूरिया पर निर्भर रहने की बजाय सभी तरह की खादों का संतुलित इस्तेमाल किया जाना चाहिए। यूरिया फसलों के लिए नाइट्रोजन का अच्छा स्रोत जरूर है,लेकिन अगर इसका ज्यादा इस्तेमाल किया जाए और बाकी खादें कम डाली जाएं तो मिट्टी में पोषक तत्वों का असंतुलन हो जाता है। लंबे समय में इससे मिट्टी की सेहत खराब होती है और फसलों की पैदावार भी घटने लगती है।

सरकार ने ये दिया है, सुझाव

हाल ही में आए आर्थिक सर्वेक्षण में सुझाव दिया गया कि यूरिया की कीमतों को थोड़ा बढ़ाया जाए और किसानों को सीधे उनके खाते में प्रति एकड़ नकद मदद दी जाए। इससे किसानों की जेब पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा,लेकिन वे अनावश्यक रूप से ज्यादा खाद डालने से बचेंगे। साथ ही अलग-अलग इलाकों और अलग-अलग फसलों के हिसाब से खाद देने की सलाह दी गई है।

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