नई दिल्ली। कहने के लिए RSS राजनीतिक दल नहीं है, परंतु हकीकत में भाजपा के गठन से लेकर आज तक पीएम, सीएम और केंद्र से लेकर राज्यों तक संगठन सहित राज्यों में वही व्यक्ति चयनित हुआ है जो RSS का रहा हो। इसलिए कहा जा सकता है कि भाजपा में उसी को कुछ मिलेगा जो RSS से जुड़ाव रखता हो। चाहे वह विपक्षी दलों से आया हुआ बागी ही क्यों न हो। उदाहरण के लिए असम के मुख्यमंत्री का नाम लिया जा सकता है जो कांग्रेस से भाजपा में शामिल होकर सीधे मुख्यमंत्री बन गए।
भाजपा ने यूपी विधान सभा सहित अन्य राज्यों में होने वाले चुनाव से पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद पर सीधे चुनाव न कराकर कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में नितिन नवीन को बैठा दिया। जबकि राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर जेपी नड्डा के बने रहते मोदी सरकार में मंत्री बनते ही ये सवाल उठने लगा था कि अब एक व्यक्ति और एक पद वाला फॉर्मूला अपनाते हुए भाजपा कोई राष्ट्रीय अध्यक्ष नया बनायेगी। पर ये सिर्फ और सिर्फ मीडिया का कयास ही साबित हुआ। हकीकत से काफी दूर रहा।
दिल्ली, हरियाणा, जम्मू कश्मीर, महाराष्ट्र और बिहार विधान सभा चुनाव से पहले भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए कई नाम मीडिया में उछाले हुए, परंतु वो मीडिया की सुर्खियां तक ही सीमित रह गए। भाजपा को दिल्ली, हरियाणा, महाराष्ट्र और बिहार चुनाव में अपार सफलता के बाद अब भाजपा ने सिर्फ राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर चुनाव न कराकर सिर्फ विकल्प की व्यवस्था करते हुए कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में नितिन नबीन को चुनकर सभी तरह के सवालों पर विराम लगा दिया है।
भाजपा शीर्ष नेतृत्व देश के सबसे बड़े राज्य यूपी में लोकसभा चुनाव के बाद मिली करारी शिकस्त के बाद संगठन में प्रदेश अध्यक्ष व प्रदेश के संगठन महामंत्री को बदलने के संकेत दिये थे। प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी और संगठन महामंत्री धर्मपाल सिंह ने लोकसभा चुनाव की हार पर अपनी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए शीर्ष नेतृत्व के सामने अपने पद से त्याग पत्र पेश करने की बात कही, परंतु उनसे उस समय त्याग पत्र नहीं लिया गया। सिर्फ समय का इंतजार किया गया।
सबसे पहले भाजपा ने यूपी के प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव की नौटंकी की और अंत में सिर्फ उसका कोरम पूरा किया गया। महराजगंज से सांसद पंकज चौधरी जो मोदी सरकार में राज्यमंत्री हैं, उन्हें यूपी के प्रदेश अध्यक्ष पद के लिये लखनऊ भेजकर उनका नामांकन कराया गया। अन्य किसी उम्मीदवार को प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए भाजपा शीर्ष नेतृत्व ने नामांकन नहीं कराया। सिर्फ चुनाव कराने का दिखावा किया गया और शीर्ष नेतृत्व अपने मनपंसदीदा उम्मीदवार उतारकर उसकी खानापूर्ति कर दी।
इस तरह भाजपा शीर्ष नेतृत्व अपने संगठन में बदलाव तो कर लिया। अब बारी है, RSS में बदलाव करने की। उसे भी चाहिए कि उन प्रचारकों के कार्यक्षेत्र में बदलाव करे जो कई सालों से मनसंदीदा क्षेत्र में अंगद सरीखे पैर जमाकर जमे हुए हुए हैं। प्रांत प्रचारक, क्षेत्र प्रचारक, जिला प्रचारक सहित RSS में बड़े पदों पर विराजमान हैं और वह अपने कर्त्तव्य पथ से भटक चुके हैं। उनका मूल कर्त्तव्य संगठन का विस्तार करना होता था और उसे मजबूती देना होता था। सही मायने में वह अब अपनी मजबूती के लिए कार्य करते हैं।
RSS में विशेषकर उन क्षेत्र प्रचारकों को केरल और तमिलनाडु सरीखे क्षेत्रों में सेवा का अवसर दे, जो सत्ता की चाय में इस कदर घुल चुके हैं कि चीनी भी उनके घोल के आगे शर्मा जाए। जिस आरएसएस का बैक ग्राउंड नानाजी देशमुख और डॉ राजेंद्र सिंह उर्फ “रज्जू भैया” की नि:स्वार्थ सेवा और समर्पण का रहा हो, वहां ऐसे क्षेत्र प्रचारकों का होना जिनके बारे में आप किसी से भी पूछ लीजिए, एक ही फीडबैक मिलेगा कि वे सत्ता और सत्ता की जाति में ऐसे एकाकार हो गए हैं, जैसे जीव के भीतर आत्मा।
संघ को चाहिए कि वो उत्तर प्रदेश में इस फीडबैक सिस्टम को शुरू करे। उसे हैरान करने वाले परिणाम मिलेंगे। वैसे भी ये जनश्रुति है कि आप जिस शुचिता की अपेक्षा दूसरों से करते हैं, सबसे पहले उसे अपने भीतर लागू करना चाहिए। RSS के भीतर भी बदलाव की आवश्यकता है। उसमें भी सड़ांध आ रही है। जब तक फिनायल डालकर अंदर तक साफ सफाई नहीं हो जाती, तब तक RSS के अंदर भी दुर्गंध आती रहेगी।
इसलिए भाजपा संगठन की तरह RSS भी अपने अंदर समय के साथ बदलाव कर ले। टिकटार्थियों को सुबह-शाम अपना दरबार न कराए और न ही उनसे धनादोहन करे। निकाय चुनाव से लेकर विधानसभा और लोकसभा चुनाव में टिकटार्थियों का टिकट पक्का कराने के लिए उन्हें भागीरथ प्रयास कराया जाता है। अंत में जब उन्हें टिकट नहीं मिल पाता तो वह कमरा में अन्धेरा करके जी भर कोसते हैं। इससे समूचे आरएसएस की बेइज्जती होती है जो उचित नहीं है।