क्रांतिकारी यतीन्द्र दास के बनाये बम से भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल, 1929 को ब्रिटिश सेंटर असेंबली पर बम फेंका था, जिससे हिल गई थी, ब्रिटिश सरकार

जेल में रहने के दौरान यतींद्र नाथ दास के मन में देश प्रेम का ज्वार बढ़ने लगा था। अब वे कुछ बड़ा योगदान देना चाहते थे। भारत माता को जल्दी से जल्दी आजाद देखना चाहते थे। जब वे असहयोग आंदोलन में कूदे तो उसे अंतिम जंग मान लिया। उन्हें लगा कि अंग्रेज इसी से देश छोड़कर भाग जाएंगे…

यतीन्द्र नाथ दास उर्फ जतीन्द्र नाथ दास उर्फ जतिन दास। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का अनमोल हीरा, जिनकी आज यानी 13 सितंबर को पुण्यतिथि है। कोलकाता में जन्म हुआ। नौ साल के थे तभी मां ने दुनिया छोड़ दी। पिता बड़े जतन से उन्हें पढ़ने को प्रेरित कर रहे थे। वे पढ़ने तो जाते लेकिन उस समय आजादी का आंदोलन देश में चल रहा था, धीरे-धीरे बालक यतीन्द्र ने देश की आजादी में अपना योगदान देने का फैसला किया।

महज 17 साल की उम्र में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में कूद पड़े। अंग्रेज पुलिस ने उन्हें अन्य आंदोलनकारियों के साथ गिरफ्तार कर लिया. अब वे स्कूल की जगह जेल पहुंच गए। आंदोलन जब धीमा पड़ा तो कुछ दिन बाद जेल से रिहा कर दिए गए।

जब यतीन्द्र दास का खौल उठा था, खून 

जेल में रहने के दौरान उनमें देश प्रेम का ज्वार बढ़ने लगा था। अब वे कुछ बड़ा योगदान देना चाहते थे। भारत माता को जल्दी से जल्दी आजाद देखना चाहते थे। जब वे असहयोग आंदोलन में कूदे तो उसे अंतिम जंग मान लिया। उन्हें लगा कि अंग्रेज इसी से देश छोड़कर भाग जाएंगे। पर, अंग्रेज कहीं नहीं गए। हां, असहयोग आंदोलन एक तरह से वापस ले लिया गया। वह महात्मा गांधी का अपना तरीका था।

यतीन्द्र दास को यह बात पसंद नहीं आई। उनका खून खौल रहा था। वे कुछ नया सोचते हुए आंदोलन में शामिल होते रहे और पिता के सुझाव पर कोलकाता में बीए करने को राजी हो गए। एडमिशन हो गया। कुछ दिन क्लासेज भी चलीं, लेकिन इसी दौरान उनकी गतिविधियों को देखते हुए अंग्रेज पुलिस ने फिर गिरफ्तार कर लिया।

जेल पहुंचकर उन्होंने देखा कि राजनीतिक कैदियों के साथ अफसर दुर्व्यवहार कर रहे हैं। जरूरी सुविधाएं भी नहीं मिल रही हैं। इनकी मांग को लेकर पहले उन्होंने अफसरों से बातचीत की। जब कोई सुनवाई नहीं हुई तो उन्होंने जेल में ही भूख हड़ताल शुरू कर दी। उस समय यह कोई आसान काम नहीं था और 21 की उम्र में तो बिल्कुल नहीं। पहले जेल अफसरों ने उनके आंदोलन को गंभीरता से नहीं लिया।

पहली बार 20 दिन तक भूख हड़ताल पर रहे थे, यतीन्द्र दास 

जेफ अफसरों को लग रहा था कि दो-चार दिन में आंदोलन की हवा निकल जाएगी। पर, यतीन्द्र दास तो 20 दिन तक भूख हड़ताल पर डटे रहे। अंत में जेल अधीक्षक ने न केवल उनसे माफी मांगी, बल्कि रिहा भी कर दिया। भूखे रहने के बावजूद जब वे जेल से छूटे तो उत्साह दोगुना हो चुका था। अंग्रेज अफसर ने उनसे माफी जो मांग ली थी।

जेल से निकल कर वे हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के संस्थापक शचीन्द्र नाथ सान्याल से मिले जो गर्म दल के आंदोलनकारी थे। थोड़ी देर में ही यतीन्द्र दास को लगा कि यह सही जगह है और वे गहरे तक उनसे जुड़ गए। वहीं यतीन्द्र दास ने बम बनाना सीख लिया। अब वे पूरी तरह से स्वतंत्रता आंदोलन में डूब चुके थे।

भगत सिंह और चंद्रशेखर की मुलाकात से मिली थी, यतीन्द्र दास को प्रेरणा  

साल- 1928 में उनकी मुलाकात सरदार भगत सिंह से हुई। फिर चंद्रशेखर आजाद, राम प्रसाद बिस्मिल भी मिले। उनकी प्रेरणा से यतीन्द्र दास ने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के लिए बम बनाना शुरू कर दिया। उन्हीं के बनाए बम से भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल, 1929 को सेंटर असेंबली पर बम फेंका था। यह एक ऐसा हमला था, जिससे ब्रिटिश सरकार हिल गई।

आनन-फानन सबकी गिरफ़्तारी के आदेश हुए और एक-एक कर सब जेल भेज दिए गए, यतीन्द्र दास भी पकड़े गए। लाहौर जेल में रखकर इन पर सशस्त्र विद्रोह का आरोप लगाया गया। लाहौर जेल में यतीन्द्र दास ने आमरण अनशन शुरू कर दिया। उनके साथ अन्य क्रान्तिकारी भी थे। मांग जरूरी सुविधाओं की थी, जो नहीं मिल पा रही थी। बहुत कठिन परिस्थितियों में भारतीय क्रांतिकारी जेल में समय काट रहे थे।

यतीन्द्र दास के आंदोलन से सहम गए थे, अंग्रेज 

यतीन्द्र दास का यह आंदोलन धीरे-धीरे चर्चा का विषय बन गया। अंग्रेज अफसर भी सहम से गए। चूँकि यतीन्द्र दास जी के शरीर से मांस का एक-एक कतरा गल चुका था। पसलियां बाहर आ गई थीं। हिलने-डुलने तक की ताकत नहीं बची थी। जब अंग्रेजों ने देखा कि यह 25 साल का लड़का टूट नहीं रहा, तो उन्होंने जबरदस्ती नाक में नली ठूंसकर दूध पिलाने की कोशिश की। वह नली खाने की नली की जगह फेफड़ों में चली गई। उन्हें जबरन पाइप से दूध पिलाने का प्रयास किया गया। दूध फेफड़ों में भर गया। वो तड़पते रहे, खून की उल्टियां करते रहे, लेकिन अनशन नहीं तोड़ा।

13 सितंबर, 1929 को लाहौर जेल में एक क्रांतिकारी ने अपने प्राण त्याग दिए। 63 दिन… जी हाँ, 63 दिन तक बिना अन्न का एक दाना खाए। इतिहास के पन्नों में अक्सर हम भगत सिंह की फांसी की बात करते हैं, लेकिन उस साथी को भूल जाते हैं, जिसने भगत सिंह की बाहों में दम तोड़ा था। 27 अक्तूबर, 1904 को दुनिया में आया एक बालक महज 25 साल की उम्र में देश पर मर मिटा।

आज हम बात कर रहे हैं ‘यतींद्र नाथ दास’ की, जिन्हें दुनिया ‘जतिन दा’ के नाम से जानती थी। पेशे से वो बम बनाने में माहिर थे, लेकिन उनका हथियार बना उनका अपना शरीर। वो चाहते तो माफी मांग सकते थे, खाना खा सकते थे। लेकिन मांग सिर्फ एक थी – “भारतीय राजनीतिक कैदियों के साथ जानवरों जैसा सलूक बंद करो।”

अंग्रेजों को लगा कि भूख इसे तोड़ देगी। लेकिन उन्हें नहीं पता था कि यह शरीर मिट्टी का नहीं, फौलाद का बना है। जब जतिन दा की हालत बिगड़ने लगी, तो अंग्रेजों ने क्रूरता की सारी हदें पार कर दीं। जेल के डॉक्टर और सिपाहियों ने उन्हें दबोच लिया। नाक से नली डाली। दर्द से वो चीखते रहे, लेकिन उनका संकल्प नहीं डिगा। उनकी शहादत की खबर जब बाहर आई, तो पूरा देश रो पड़ा था।

अंतिम संस्कार में छः लाख से अधिक लोग हुए थे, शामिल

कहा जाता है कि जब उनका शव लाहौर से कलकत्ता ले जाया जा रहा था, तो हर स्टेशन पर हजारों लोग फूल लेकर खड़े थे। कलकत्ता में उनकी अंतिम यात्रा में छः लाख से ज्यादा लोग शामिल हुए। सुभाष चंद्र बोस ने खुद उनके पार्थिव शरीर को कंधा दिया था। लेकिन आज ? आज कितने लोग उस 63 दिन की तपस्या को याद करते हैं ?

मरते वक्त यतीन्द्र दा ने कहा था, “मैं कोई साधु नहीं हूँ, मैं बस एक साधारण इंसान हूँ जो अपने देश की गरिमा के लिए मरना चाहता है।” आजादी चरखे से आई या बिना खड्ग-ढाल के, यह बहस का विषय हो सकता है। लेकिन यह सच है कि आजादी की नींव में यतीन्द्र दा जैसे नौजवानों की गल चुकी हड्डियां गड़ी हैं। हमें यह आजादी खैरात में नहीं मिली, इसके लिए किसी ने अपनी जवानी के 63 दिन भूखे रहकर कुर्बान किए हैं।

यतीन्द्र के अंतिम संस्कार में पांच लाख से ज्यादा लोग शामिल हुए। सड़कों पर लोगों का हुजूम था। लाहौर से कोलकाता तक रास्ते में बड़ी संख्या में लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। नेहरू, गणेश शंकर विद्यार्थी ने उन्हें कानपुर स्टेशन पर श्रद्धांजलि देने पहुंचे। हावड़ा स्टेशन पर सुभाष चंद्र बोस ने उनके अंतिम दर्शन किए। एक आंदोलनकारी की असमय जेल में मृत्यु के बाद उसकी लोकप्रियता ने अंग्रेजों के माथे पर बल ला दिया।

इसके बाद से उन्होंने किसी भी आंदोलनकारी का शव परिवार को नहीं सौंपा। फांसी के बाद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के शव गुपचुप सतलुज नदी के किनारे आधी रात अंतिम संस्कार कर दिए। सुभाष चंद्र बोस ने उनकी तुलना ऋषि दधीचि से की थी। उनकी मौत के बाद देश भर में प्रदर्शन हुए।

हर भारतीय का कर्तव्य है कि वो जाने कि जिस हवा में वो सांस ले रहा है, उसकी कीमत क्या थी ? इस जानकारी को साझा करें ताकि आने वाली पीढ़ियां जान सकें कि असली ‘हीरो’ कौन थे। यह पोस्ट केवल उन भूले-बिसरे नायकों को नमन करने के लिए है।

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