देश के पहले कानून मंत्री और संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर के संघर्ष की कहानियों से सदियों से भारतीय प्रेरित होते आए हैं। बचपन से ही भेदभाव झेलने वाले अंबेडकर के जीवन में कम चुनौतियां नहीं आईं; उन्होंने हर चुनौती का सामना करते हुए खुद को साबित किया और उनकी इस सफलता के पीछे उनकी पत्नी रमाबाई अंबेडकर का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
7 फरवरी, 1898 को महाराष्ट्र के वणंद गांव में, एक गरीब परिवार में जन्मीं रमाबाई अंबेडकर के सिर से छोटी उम्र में ही माता-पिता का साया उठ गया। इसलिए उनके मामा जी ने उनकी परवरिश की। महज़ 15 साल की उम्र में भीमराव अंबेडकर से उनका विवाह हो गया।
अपनी किताब ‘थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ में डॉ. अंबेडकर ने लिखा है कि उन्हें साधारण व्यक्ति से बाबासाहेब अंबेडकर बनाने का श्रेय रमाबाई को ही जाता है, जो हर हालात में उनके साथ रहीं। उनकी वजह से ही अंबेडकर बाहर जाकर अपनी पढ़ाई पूरी कर पाए।
बाबा साहेब वर्षों अपनी शिक्षा के लिए बाहर रहे और इस समय में लोगों की बातें सुनते हुए भी रमाबाई ने घर को संभाले रखा। जीवन में मुश्किलें ऐसी आईं कि उनके और बाबा साहेब के पांच बच्चों में से सिर्फ़ एक, यशवंत ही जीवित रहे। फिर भी रमाबाई टूटी नहीं, खुद हिम्मत रखी और बाबासाहेब का मनोबल भी बढ़ाती रहीं।
उनके इसी धैर्य और समर्पण के कारण अक्सर उन्हें ‘त्यागवंती रमाई’ भी कहा जाता है। 29 सालों तक बाबासाहेब का साथ निभाने के बाद साल 1935 में एक लंबी बीमारी के चलते रमाबाई का निधन हो गया। आज उनकी जयंती पर हम उन्हें शत-शत नमन करते हैं।