समाजवादी पार्टी के रानीगंज विधायक डॉ आर के वर्मा के नामांकन के साथ दाखिल होने वाले हलफनामें को पूर्व विधायक धीरज ओझा ने दी है, हाईकोर्ट में चुनौती 

लगातार तीसरी बार विधायक निर्वाचित होने डॉ आर के वर्मा के नामांकन और दाखिल हलफनामें में जन्म तिथि, बैंक बैलेंस, मतदाता सूची में नाम समेत कई डॉक्यूमेंट में विधायक डॉ आर के वर्मा ने सच को छुपाया है और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम-1950 का किया है, उल्लंघन…

रानीगंज विधानसभा में समाजवादी पार्टी के टिकट से चुनाव लड़कर विधायक तो बन गए,परन्तु उनके द्वारा किये गए नामांकन में जिला निर्वाचन अधिकारी के समक्ष दिए गए हलफनामें में कई तथ्य छिपाने का आरोप लगाते हुए हाईकोर्ट खंडपीठ लखनऊ में पूर्व विधायक अभय कुमार उर्फ धीरज ओझा ने एक इलेक्शन पेटीशन दाखिल किया है, जिसे हाईकोर्ट ने स्वीकार कर सभी पक्षकारों को नोटिस जारी किया है। 250 रानीगंज विधानसभा से विधानसभा-2022 का चुनाव बहुत संघर्ष के बाद सीटिंग विधायक को शिकस्त देकर समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी रहे डॉ आर के वर्मा चुनाव जीत तो लिया, परन्तु उनकी मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। यदि इलेक्शन पेटीशन में दाखिल तथ्य सही पाए जाते हैं तो विधायक डॉ आर के वर्मा की विधानसभा सदस्यता निरस्त हो सकती है और एक मुकदमा अलग से गिफ्ट में मिल सकता है। रिटर्निंग ऑफिसर के समक्ष नामांकन के साथ जो हलफनामा प्रत्याशियों द्वारा पेश किया जाता है, वह 99फीसदी चुनाव में नामांकन के जानकार अथवा अधिवक्ताओं के द्वारा तैयार किये जाते हैं।

सम्पत्ति का उल्लेख प्रत्याशी अथवा उसका सीए या मुंशी/मुनीम तय करता है, वह भी आयकर रिटर्न के मुताविक उसका निर्धारण किया जाता है। अपराध की स्थिति भी उम्मीदवार के बताये अनुसार नामांकन के साथ लगने वाले हलफनामें में दर्शाया जाता है। जन्मतिथि और मतदाता सूची में प्रत्याशी का नाम और उम्र में अक्सर अन्तर रहता है, परन्तु प्रत्याशी मजबूरी में जो उम्र मतदाता सूची में उल्लेखित होती है, उसे ही वह दर्शाता है। अक्सर बड़े नेताओं का नाम दो विधानसभाओं में दर्ज रहता है और वह सुविधानुसार उसका उपयोग करता है। जबकि यह लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम-1950 की धारा-13 के अनुसार अपराध कारित करने जैसा है। फिर भी बड़े नेता इसका ध्यान नहीं देते। विधायक डॉ आर के वर्मा भी उन्हीं नेताओं में से हैं। डॉ आर के वर्मा जब विश्वनाथगंज विधानसभा से विधायक निर्वाचित हुए थे तो वह दो विधानसभाओं में मतदाता के रूप में दर्ज थे। एक विश्वनाथगंज विधानसभा में और दूसरा सोरांव विधानसभा में भी मतदाता के रूप में मतदाता सूची में दर्ज थे।

इसका खुलासा तब हुआ जब लोकसभा सदस्य पद से केशव प्रसाद मौर्य ने त्याग पत्र दिया और वहां उप चुनाव हुआ तो उस उप चुनाव में जब डॉ आर के वर्मा मतदानकिये तो मीडिया में उनकी फोटो प्रकाशित हुई थी। शैक्षिक योग्यता और उससे सम्बन्धित तथ्य भी प्रत्याशी ही तय करता है और वह भले ही अपना नामांकन नहीं भरता परन्तु उसका हस्ताक्षर प्रत्येक पेज पर होता है और वह पूर्णतः उसके प्रति जवाबदेह होता है। पूर्व विधायक धीरज ओझा द्वारा दाखिल इलेक्शन पेटीशन के तथ्यों को समझने के बाद ऐसा प्रतीत होता है कि निर्वाचित विधायक डॉ आर के वर्मा के नामांकन में दाखिल हलफनामें में बहुत सारी कमियां हैं, जिसे चुनाव परिणाम के बाद अक्सर लोग भूल जाया करते हैं। डॉक्यूमेंट फ्रॉड को लेकर पूर्व विधायक धीरज ओझा ने इलेक्शन पेटीशन दायर की है, जिसमें जन्म तिथि, बैंक बैलेंस, मतदाता सूची समेत कई डॉक्यूमेंट में विधायक डॉ आर के वर्मा ने सच को छुपाया है। यदि विधायक डॉ आर के वर्मा वास्तव में अपने नामांकन में दाखिल हलफनामें में तथ्यों को छिपाया है तो यह गंभीर मामला है। 

झूठा हलफनामा दाखिल करना भी अपराध माना गया है। पूर्व विधायक धीरज ओझा की याचिका पर यदि समय के साथ फैसला हुआ तो डॉ आर के वर्मा के लिए यह गलती नुकसानदेह साबित होगी। हाईकोर्ट खंडपीठ लखनऊ ने मामले को संज्ञान में लेकर विधायक डॉ आर के वर्मा समेत सभी प्रत्याशियों को नोटिस जारी किया है। फिलहाल ऐसी त्रुटी 70फीसदी जीते हुए विधायक के नामांकन में मिल जायेगी, परन्तु एक विधायक से कोई लड़ना नहीं चाहता, क्योंकि वह सामान्य आदमी से माननीय जो बन जाता है। चुनाव के बाद नामांकन में झूठा हलफनामा देने वाले सभी प्रत्याशियों की जांच निष्पक्षता के साथ करनी चाहिए और जो प्रत्याशी झूठा हलफनामा दिया हो उसके खिलाफ एक मुकदमा और लिखने का आदेश जारी करना चाहिए। उस दायरे में निर्वाचित विधायक भी आता है तो उसकी विधानसभा सदस्यता भी रद्द कर देनी चाहिए, वह भी छः माह के अंदर। ऐसा करने से राजनीति में सुचिता और पारदर्शिता के साथ-साथ इमानदारी का उदय होगा। नेता भी इमानदार होने लगेंगे । उनमें भी भय ब्याप्त होगा कि गलत करेंगे तो उन्हें भी उसकी सजा मिलेगी। इसलिए चुनाव में नामांकन में दाखिल होने वाले हलफनामें की सत्यता की जांच निष्पक्षता के साथ होनी चाहिए।   

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