किस्मत कह लीजिए या राजनीतिक सूझ-बूझ या फिर गुरु गोरखनाथ का आशीर्वाद

राजनीति में जो भी योगी आदित्यनाथ जी के सामने उनका प्रतिद्वंदी बना, उसका राजनीतिक प्रभाव समय के साथ सीमित होता चला गया। कुछ लोग इसे संयोग कहते हैं, कुछ इसे रणनीति मानते हैं और कुछ इसे संत-सत्ता के अद्भुत मेल का परिणाम। पर इतना तो तय है कि योगी आदित्यनाथ के सामने खड़े होकर राजनीति करना आसान नहीं रहा। क्योंकि योगीजी के पास शत्रुहन्ता योग है। उनसे लड़ने वाला ब्यक्ति स्वतः धराशायी हो जाता है।

कुछ नाम का उल्लेख किया जाना महत्वपूर्ण है। साल- 2002 में तत्कालीन मुख्यमंत्री थे, राजनाथ सिंह जी। गोरखपुर सदर से BJP के दिग्गज नेता, लगातार 4 बार विधायक, कैबिनेट मंत्री शिव प्रताप शुक्ला। पूरा संगठन उनके साथ था। लेकिन योगी जी ने अखिल भारतीय हिंदू महासभा से राधा मोहन दास अग्रवाल को प्रत्याशी बनाया। परिणाम चौंकाने वाला रहा। राधा मोहन दास अग्रवाल विजयी। शिव प्रताप शुक्ला तीसरे स्थान पर।

इस चुनाव के बाद शिव प्रताप शुक्ला जी लगभग 15 वर्षों तक संगठनात्मक राजनीति तक ही सीमित रहे। बाद में राज्यसभा और फिर राज्यपाल बनाकर उन्हें सम्मान अवश्य मिला, लेकिन सक्रिय राजनीति में उनकी भूमिका पहले जैसी नहीं रही। पूर्व केंद्रीय मंत्री शिव प्रताप शुक्ला को हिमाचल प्रदेश का नया राज्यपाल बनाया गया है। शिव प्रताप शुक्ला मूल रूप से गोरखपुर के खजनी के रुद्रपुर के रहने वाले हैं तथा वर्तमान में लखनऊ तथा दिल्ली में निवास करते हैं।

शहर विधानसभा से चार बार विधायक और तीन बार केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं। शिवप्रताप शुक्ल राज्यसभा के सदस्य भी रह चुके हैं। शिव प्रताप शुक्ल ने अपनी सियासी सफर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद मेरा कर शुरू किया उन्होंने अपने राजनीतिक कैरियर में बहुत सारे उतार-चढ़ाव भी देखें। शुक्ला को उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाली सरकारों में राज्य मंत्री नियुक्त किया गया था।

मनोज सिन्हा साल- 2017 में UP में BJP की ऐतिहासिक जीत के बाद मुख्यमंत्री पद के लिए जिस नाम की सबसे ज्यादा चर्चा थी, वो था मनोज सिन्हा। यहाँ तक कहा गया कि बनारस में उन्हें CM स्तर का प्रोटोकॉल तक मिलने लगा था। लेकिन राजनीति परिस्थितियों से चलती है। साल- 2019 लोकसभा चुनाव में मनोज सिन्हा चुनाव हार गए। बाद में LG बनकर एक तरह से सक्रिय राजनीति से सम्मानजनक दूरी बन गई।

उपेंद्र दत्त शुक्ला, साल- 2018 गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव में योगी जी के विरोधी गुट ने शिव प्रताप शुक्ला के करीबी उपेंद्र दत्त शुक्ला को टिकट दिलाया। नतीजा वही रहा, चुनाव में पराजय और राजनीतिक प्रभाव सीमित हो गया। इसके पहले उपेंद्र कौड़ीराम विधानसभा से तीन बार चुनाव लड़ चुके हैं। पहली बार वर्ष 1996 में यहां से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़े, लेकिन हार गए। वर्ष 2002 में भाजपा ने यहां से गौरी देवी को टिकट दिया, लेकिन उन्हें भी हार का सामना करना पड़ा।

पीएम मोदी और अमित शाह जी के सबसे भरोसेमंद ब्यूरोक्रेट्स में गिने जाने वाले AK शर्मा को साल- 2021 में गुजरात से समय से पहले VRS लेकर UP की राजनीति में प्रवेश कराने के पीछे की बात करें तो उन्हें CM या Dy CM बनाया जायेगा, लेकिन हकीकत में BJP प्रदेश उपाध्यक्ष (जहाँ पहले से 17 लोग थे) बाद में किसी तरह MLC, वर्तमान में कैबिनेट मंत्री। AK शर्मा को जिस स्तर की उम्मीदें थीं, उस अनुपात में उनका राजनीतिक प्रभाव, उतना सशक्त बनता नहीं दिखा और भविष्य को लेकर चर्चाएँ बनी हुई हैं।

केशव प्रसाद मौर्य साल- 2017 विधानसभा चुनाव के बाद UP में BJP को मिले प्रचंड बहुमत के बाद मुख्यमंत्री पद के लिए सबसे ज्यादा चर्चा केशव प्रसाद मौर्य जी के नाम की थी। वे उस समय प्रदेश अध्यक्ष भी थे, लेकिन CM बने योगी आदित्यनाथ और केशव प्रसाद मौर्य जी को Dy CM पद से संतोष करना पड़ा। साल- 2018 में योगी जी के खिलाफ BJP के लगभग 200 विधायक धरने पर बैठे। यह दौर भी सबने देखा। फिर आया साल- 2022 का और विधानसभा चुनाव में केशव मौर्य अपनी सीट हार गए।

बुरी तरह परास्त होने के बाद भी भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के दबाव में योगी आदित्यनाथ जो को केशव प्रसाद मौर्य को मंत्रिमंडल में शामिल करना पड़ा और न चाहते हुए भी केशव प्रासद मौर्य को Dy CM बनाना पड़ा। हालांकि इस बार उन्हें उनका मनचाहा विभाग नहीं दिया गया, बल्कि मंत्रालय सीमित कर दिया गया। आज स्थिति यह है कि राजनीतिक प्रभाव से अधिक PR के जरिए सक्रियता दिखाई देती है।

UP में जब-जब CM परिवर्तन की चर्चा हुई, तब-तब भाजपा के अंदर ही बवंडर मच जाता है। राजनीति में जो दिखता है वह होता नहीं और जो होता है, वह दिखता नहीं। फ़िलहाल वर्तमान भाजपा में मोदी और अमित शाह के दौर में वही होता है जो सबसे परे हो, जिस पर लोग विचार ही न किये हो ! राजनीति में इसीलिये अमित शाह को राजनीती का चाणक्य कहा जाता है। आज भाजपा में वही होता है जो भाजपा के चाणक्य चाहते हैं, सिर्फ योगी जी के मामले में अमित शाह मुंह की खा ले रहे हैं।

लोकसभा चुनाव के बाद से यूपी में भाजपा अपना प्रदेश अध्यक्ष बदलना चाह रही थी, परन्तु अन्य राज्यों के चुनाव में शीर्ष नेतृत्व उलझा हुआ था। इसलिए बिहार चुनाव की अपार सफलता के बाद यूपी का प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी को बनाया गया। हालांकि भाजपा, पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष को लोकतान्त्रिक तरीके से निर्वाचित करने का दावा किया, परन्तु पंकज चौधरी को अकेले ही नामांकन कराकर इस पर भी सवालिया निशान लगा दिया।

भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पर किसी ने सोचा भी नहीं था कि पंकज चौधरी को भाजपा शीर्ष नेतृत्व प्रदेशध्यक्ष बनायेगी। पंकज चौधरी की बात करें तो वह भी योगी आदित्यनाथ जी के विरोधी खेमे के माने जाते हैं। पंकज चौधरी गोरखपुर से आते हैं और राहत रूह तेल के मालिक हैं। वह महारजगंज से 2 बार 4 लाख से अधिक वोटों से जीत दर्ज की। लेकिन इस बार जीत का अंतर घटकर सिर्फ 30 हजार वोट रह गया। राजनीति संकेतों से चलती है और संकेत बहुत कुछ कह जाते हैं।

निष्कर्ष यह, डर की राजनीति नहीं है, यह अपमान की राजनीति नहीं है। यह उस नेतृत्व की कहानी है जो धर्म, राष्ट्र और निर्णय को सत्ता से ऊपर रखता है। योगी आदित्यनाथ के सामने जो भी सत्ता की महत्वाकांक्षा लेकर खड़ा हुआ, राजनीतिक परिस्थितियाँ उसके लिए अलग दिशा में जाती दिखाई दीं। क्योंकि योगी जी सिर्फ मुख्यमंत्री नहीं, एक विचार, एक संकल्प और एक युग का नाम हैं।

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