तत्कालीन एसडीएम सदर उदय भान सिंह की काली करतूतों से प्रतापगढ़ की सदर तहसील का भरा पड़ा है, अभिलेखागार

तत्कालीन एसडीएम सदर अपने कार्यकाल में न्यायालय में जानबूझकर कराते थे, मुकदमें का दायरा
प्रतापगढ़। तत्कालीन एसडीएम सदर उदय भान सिंह की काली करतूतों को तत्कालीन जिलाधिकारी प्रतापगढ़ संजीव रंजन जी संज्ञान में नहीं ले रहे थे अथवा सबकुछ जानते व समझते हुए भी तत्कालीन एसडीएम सदर उदय भान सिंह को सदर तहसील में हिटलरशाही करने की छूट दे रखा था। तत्कालीन जिलाधिकारी प्रतापगढ़ संजीव रंजन जी के इस छूट के नतीजे की एक बानगी पेश कर रहा हूँ जो किसी बड़ी कारगुजारियों से कम नहीं है।
दलालों के जरिये तत्कालीन एसडीएम सदर उदय भान सिंह सरकारी जमीनों का भी करते थे, सौदा…
तत्कालीन एसडीएम सदर उदय भान सिंह जी तालाबी अराजी को भी खारिज करके उसे खातेदारों के नाम से इन्द्राज करा दिया था। जिसे उनके रिटायरमेंट के बाद एसडीएम सदर शैलेन्द्र वर्मा ने उक्त आदेश को स्टे कर दिया और आज भी उसमें उप जिला मजिस्ट्रेट सदर के न्यायालय में तारीख पर तारीख नियत की जाती है। जबकि उक्त आदेश को तत्काल प्रभाव से निरस्त करके खातेदारों पर मुकदमा दर्ज करवाना चाहिए था। ताकि खातेदार यह बताने के लिए विवश होते कि उनसे कितने रूपये लेकर तालाबी आराजी को तत्कालीन एसडीएम सदर उदय भान सिंह जी द्वारा बेंचा गया था ?
पेशकार और अहलमद सहित दलालों के माध्यम से वादी और प्रतिवादी दोनों को अलग-अलग समय करते थे, डील
ये सब मनमानी पूर्ण कार्य तत्कालीन एसडीएम सदर उदय भान सिंह खुलेआम करते रहे और तहसील सदर में देर तक एसडीएम का चैंबर खोलकर बैठे रहते थे। तहसील सदर से ट्रांजिट हास्टल में आवंटित आवास पर सीधे लेनदेन का कार्य सम्पन्न हुआ करता था। ये बातें जिलाधिकारी स्वयं जानते रहे, परन्तु धृतराष्ट्र बने रहे। वैसे तो एंटी करप्शन टीम जिले में कई ट्रेपिंग की, परन्तु तत्कालीन एसडीएम सदर उदय भान सिंह की ट्रेपिंग करने की हिम्मत उनमें नहीं हो सकी। क्योंकि तत्कालीन जिलाधिकारी महोदय संजीव रंजन जी स्वयं तत्कालीन एसडीएम सदर उदय भान सिंह पर मेहरबान रहे।
बाहरी ब्यक्तियों के द्वारा सदर तहसील के बाहर मुकदमें में आदेश की पत्रावली होती थी, तैयार
तभी तो तत्कालीन जिलाधिकारी संजीव रंजन की कृपा पर तत्कालीन एसडीएम सदर उदयभान सिंह ने अपने कार्यकाल में प्रतापगढ़ से लगभग 3 करोड़ रूपये से अधिक भ्रष्टाचार से अर्जित किये और अर्जित धन का सभी के बीच बंदरबांट किया गया। तत्कालीन एसडीएम सदर उदय भान सिंह ने भ्रष्टाचार के जरिये अकूत दौलत बनाई। वाराणसी और कानपुर सहित गाजियाबाद में उनके आवास उनके भ्रष्टाचार के जीते जागते उदहारण हैं। उनका वेतन 80 हजार रूपये से भी कम रहा। इससे साबित होता है कि उनकी ऊपरी आमदनी कितनी रही होगी ? तभी तो मेट्रो सिटी में आलीशान आवास बनाये जा सके।
नियम-कानून को ताख पर रखकर तत्कालीन एसडीएम सदर उदय भान सिंह द्वारा जारी किये जाते थे, आदेश
यही नहीं तत्कालीन एसडीएम सदर, प्रतापगढ़ उदय भान सिंह कलेक्ट्रेट के अंग्रेजी दफ्तर से अपनी सेवा पुस्तिका तक लेकर भाग गए। रिटायरमेंट के बाद भी उसे जमा नहीं किये। शासन स्तर पर उनके द्वारा किये गए भ्रष्टाचार की जाँच जारी है। यक्ष प्रश्न है कि एक एसडीएम की मॉनिटरिंग करने के लिए जिलाधिकारी के अलावा एडीएम और सीआरओ भी होते हैं। मण्डल स्तर पर मंडलायुक्त महोदय होते हैं। फिर भी सदर एसडीएम सदर उदय भान सिंह की तानाशाही कम नहीं हुई। क्योंकि जब नाक के नीचे सदर तहसील की मॉनिटरिंग जिलाधिकारी महोदय नहीं कर पा रहे थे, तो शेष चार तहसील जो जिला मुख्यालय से काफी दूर हैं, उनकी मॉनिटरिंग जिलाधिकारी महोदय कैसे करते होंगे ?