क्या काॅकरोच पार्टी को मिल सकता है कॉकरोच चुनाव चिह्न,जानें क्या कहते हैं EC के नियम
नई दिल्ली। सोशल मीडिया सेंसेशन कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) बीते कुछ दिनों से युवाओं के बीच खासा पहचान बना चुकी है।सीजेपी सोशल मीडिया की दुनिया से निकलकर जमीन पर आ चुकी है।सियासी गलियारों में भी इसकी चर्चाएं जोरों पर हैं।कारण 6 जून को राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुआ इसका पहला प्रदर्शन। इसमें केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांगा गया था।अब सवाल उठने लगा है कि अगर भविष्य में यह संगठन राजनीतिक पार्टी के रूप में दर्ज होता है, तो क्या उसे चुनाव चिह्न कॉकरोच मिल सकता है।
सीजेपी राजनीतिक दल नहीं,भविष्य में अगर…
मौजूदा समय में काॅकरोच जनता पार्टी खुद को कोई राजनीतिक पार्टी नहीं बल्कि एक Youth Pressure Group बताती है।आसान भाषा में कहें तो ऐसा समूह,जिसका लक्ष्य सत्ता में आना नहीं है,बल्कि सरकार की नीतियों और फैसलों को प्रभावित करना होता है और ये काम युवाओं के समूह द्वारा होता है। हालांकि सीजेपी फाउंडर अभिजीत दिपके ने यह संकेत दिया है कि आने वाले समय में सीजेपी को राजनीतिक पार्टी के तौर पर रजिस्टर कराने पर विचार किया जा सकता है। अब यहीं से इस बहस को आधार मिलता है। अगर ऐसा हुआ,तो क्या पार्टी बन जाने भर से उसे अपनी पसंद का चुनाव चिह्न मिल जाएगा।
नई राजनीतिक पार्टी को कैसे मिलता है चुनाव चिह्न
आइए सबसे पहले समझें नियम क्या है।चुनाव आयोग चुनाव चिन्हों का आवंटन इलेक्शन सिंबल्स (रिजर्वेशन एंड अलॉटमेंट) ऑर्डर 1968 के तहत करता है। राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय मान्यता प्राप्त दलों के पास अपने रिजर्व चुनाव चिन्ह होते हैं। उदाहरण के लिए भाजपा का कमल और कांग्रेस का हाथ,लेकिन नई या गैर-मान्यता प्राप्त पार्टियों को चुनाव आयोग की ओर से तय की गई फ्री सिंबल लिस्ट में से चुनाव चिह्न अलॉट किया जाता है।
फ्री लिस्ट में कई नाम शामिल,मांगा गया चिह्न मिले गारंटी नहीं
सबसे दिलचस्प बात यह है कि चुनाव आयोग की फ्री सिंबल लिस्ट में सैकड़ों चिह्न शामिल हैं। इनमें एयर कंडीशनर,डोर बेल,डस्टबिन,फ्राइंग पैन,टीवी रिमोट,गुब्बारा,अंगूर,कटहल, केक और टूथब्रश जैसे चिह्न मौजूद हैं।कोई नई पार्टी इनमें से किसी भी प्रतीक की मांग कर सकती है। हालांकि उसे वही चिह्न मिलेगा,इसकी कोई गारंटी नहीं होती। अंतिम फैसला चुनाव आयोग ही करता है।
सीजेपी को कॉकरोच चुनाव चिह्न मिल सकता है या नहीं
आप सोच रहे होंगे कि ये सवाल तो अभी भी बना हुआ है कि कॉकरोच चुनाव चिह्न मिलेगा या नहीं। आसान शब्दों में कहें तो इसकी संभावना न के बराबर है,क्योंकि 1990 के दशक में एनिमल राइट्स से जुड़े संगठनों ने पशुओं से जुड़े चुनाव चिह्न देने पर आपत्ति जतानी शुरू कर दी थी। इसके बाद बाद चुनाव आयोग ने जीव-जंतुओं को चुनाव चिह्न के रूप में आवंटित करने की नीति से दूरी बनानी शुरू कर दी थी। यही वजह है कि आज की फ्री सिंबल लिस्ट में अधिकांश चिह्न निर्जीव वस्तुओं, फलों, सब्जियों या घरेलू उपयोग की चीजों से जुड़े हैं।
कुछ दलों के चिन्ह अभी भी जीव-जंतुओं से जुड़े हैं
हालांकि अभी भी कुछ दलों के चिन्ह जानवरों से जुड़े हैं। हालांकि बहुजन समाजवादी पार्टी का चुनाव चिह्न हाथी है। ऐसे ही कुछ अन्य दलों को भी हाथी,मुर्गा और शेर चिह्न मिला हुआ है। इसके अलावा देखा जाए तो कॉकरोच तकनीकी रूप से एक कीट (Insect) है, लेकिन वह भी जीव-जंतु की श्रेणी में ही आता है। अगर भविष्य में सीजेपी चुनावी राजनीति में उतरती है, तो उसे शायद कॉकरोच नहीं बल्कि चुनाव आयोग की सूची में मौजूद किसी अन्य फ्री सिंबल के साथ मैदान में उतरना पड़े,क्योंकि इसकी संभावना न के बराबर है।
हाथी- बहुजन समाजवादी पार्टी
हाथी- असम घाना परिषद
शेर- गोवा- महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी
शेर- मेघालया- हिल स्टेट पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी
शेर- पश्चिम बंगाल- ऑल इंडिया फॉर्वड ब्लॉक
मुर्गा- मणिपुर, नागालैंड- नागा पीपुल्स फ्रंट
बताते चलें कि कॉकरोच जनता पार्टी का जन्म एक विवाद के बाद हुआ है।भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की एक टिप्पणी के बाद कुछ युवाओं ने कॉकरोच शब्द को विरोध और व्यंग्य के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल करते हुए इंस्टाग्राम पर एक अकाउंट बनाया। यह देखते ही देखते कुछ ही दिनों में करोड़ों युवाओं द्वारा फॉलो किया गया। इसके बाद सोशल मीडिया सेंसेशन एक संगठित आंदोलन के रूप में सामने आया और जंतर-मंतर पर प्रदर्शन तक पहुंच गया।