हाईकोर्ट की दखल के बाद नगरपालिका प्रशासन को काश्तकार की लगभग 19 बिस्वा जमीन पर जबरन बनाये गए पार्क को कराना पड़ा ध्वस्त

नगरपालिका प्रशासन को काश्तकार की लगभग 19 बिस्वा जमीन पर जबरन बनाये गए पार्क को कराना पड़ा ध्वस्त…

अब आया ऊँट पहाड़ के नीचे, अपने निर्माण को मानना पड़ा अवैध और करनी पड़ी ध्वस्तीकरण की कार्यवाही…

प्रतापगढ़ में मुख्यमंत्री के ड्रीम पोजेक्ट पर उनके निकम्मे विभागों ने बुल्डोजर चलवाने का काम किया है। राजस्व विभाग पहले बिना जाँचे समझे जमीन का सीमांकन किया और कमीशनखोरी के चक्कर में नगरपालिका प्रशासन ने उस पर आनन फानन में कार्य भी शुरू करा डाला। नतीजा यह हुआ कि अब कार्यदायी संस्था नगरपालिका द्वारा अपने ही कार्य पर ध्वस्तीकरण की कार्यवाही स्वयं के बुल्डोजर से कराना पड़ रहा है।

प्रतापगढ़ में राजस्व अधिकारियों एवं कर्मचारियों के निकम्मेपन का ताजा उदाहरण रंजीतपुर चिलबिला सच्चा आश्रम के बगल, बराछा मोड़ से कुछ दूर पर सई नदी के उत्तरी तट पर पार्क का निर्माण कार्य हो रहा था, परंतु ग्राम समाज की भूमि और भूमिधरी भूमि के चिन्हांकन में घोर लापरवाही बरतते हुए काश्तकार मनोज पाण्डेय आदि की भूमिधरी भूमि को ग्राम समाज की बताकर उस पर जबरन बाउंड्रीवाल बनाकर उसे नगरपालिका प्रशासन अपने कब्जे में ले लिया।

सदर तहसील के सबसे भ्रष्टतम एसडीएम रहे उदय भान सिंह उस दौरान स्वयं को हिटलर से कम नहीं मानते थे। मुख्यमंत्री के ड्रीम पोजेक्ट के नाम पर सई नदी के किनारे पार्क और घाट के निर्माण के लिए जब जिलाधिकारी प्रतापगढ़ से जमीन देने के लिए कहा गया तो जिस जमीन का सीमांकन किया गया वह दफा सरपट किया गया। काश्तकार मनोज पाण्डेय आदि ने विरोध किया तो उन्हें प्रशासन का डंडा दिखाकर चुप रहने के लिए विवश किया गया।

नगरपालिका प्रशासन और तहसील सदर के राजस्व अधिकारियों की दबंगई से आजिज आकर काश्तकार मनोज पाण्डेय हाईकोर्ट खण्डपीठ लखनऊ की शरण ली। जहाँ से कार्य को रोकने का आदेश पारित हो गया। काफी दिन तक जिला प्रशासन, नगरपालिका प्रशासन और काश्तकारों के बीच बातचीत का प्रयास कर मामले को निस्तारित करने की पहल की गई, परन्तु कुछ अकडू किस्म के लोगों ने बनते काम को बिगड़ने का कार्य किया।

नगरपालिका प्रशासन की तरफ से भी हठधर्मिता अपनाने का कार्य किया गया। नगरपालिका प्रशासन को लगा कि उसके आगे सारे लोग बौने हैं। कोई उसका क्या कर लेगा। पर लड़ने वाले के आगे वास्तव में सब बौने हो जाते हैं। इस प्रकरण में भी वही हुआ। आखिरकार सरकार के इस ड्रीम प्रोजेक्ट पर सरकार यानि नगरपालिका प्रशासन ने स्वयं अपना बुल्डोजर चलवाकर स्वयं द्वारा बनवाए गए निर्माण को ध्वस्त करना पड़ा।

अब इससे अधिक घोर बेइज्जती और क्या हो सकती है ? नगरपालिका प्रशासन का भी घमंड चकनाचूर हो गया। बात यहीं खत्म नहीं होती। बात निकली है तो दूर तक जायेगी। सबसे बड़ा सवाल कि किसी भी प्रोजेक्ट के लिये यदि जमीन का आवंटन राजस्व विभाग करता है तो उसकी पूरी जिम्मेदारी राजस्व विभाग की हो जाती है कि जिस जमीन पर वह प्रोजेक्ट तैयार होगा, कम से कम वह जमीन पाकसाफ हो। उसमें किसी प्रकार का विवाद न हो।

साल- 2019 में शासन द्वारा नगरपालिका प्रतापगढ़ का विस्तार किया गया। बड़ा क्षेत्र पंचायत से काटकर नगरपालिका को मिला। फिर ग्राम समाज की जमीन भी नगरपालिका को प्राप्त हुई। सच्चा आश्रम के बगल सई नदी के उत्तरी तट पर माँ बेल्हा माई धाम के ठीक सामने पार्क बनाने का प्रस्ताव शासन को गया और धन आवंटन भी हो गया। क्योंकि प्रोजेक्ट सीधे मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद बना था। फिर भी इतनी घोर लापरवाही बरती गई।

अब प्रोजेक्ट को स्थापित करने के लिए जमीन की आवश्यकता हुई। तत्कालीन एसडीएम सदर उदय भान सिंह जो भ्रष्टतम अधिकारियों में से एक रहे। जिनका काम ही सुबह से शाम तक धन कमाना होता था। उन्हें पार्क हेतु जमीन आवंटन के लिये तत्कालीन जिलाधिकारी प्रतापगढ़ संजीव रंजन ने निर्देशित किया था। वह तत्कालीन जिलाधिकारी प्रतापगढ़ संजीव रंजन के बहुत ख़ास अफसरों में से एक रहे। एक तरह से वह सदर तहसील के डीएम थे।

तत्कालीन जिलाधिकारी प्रतापगढ़ संजीव रंजन के निर्देश पर तत्कालीन एसडीएम सदर उदयभान सिंह तत्कालीन हल्का लेखपाल रंजीतपुर चिलबिला सुशील कुमार मिश्र ने जमीन का सीमांकन कर नगरपालिका प्रतापगढ़ को दे दिया और कार्यदायी संस्था नगरपालिका ने आनन फानन में टेंडर निकाल कर अपने चहेते ठेकेदार को कार्य आवंटित कर पार्क बनाने का कार्य प्रारंभ कर दिया।

तत्कालीन हल्का लेखपाल रंजीतपुर चिलबिला सुशील कुमार मिश्र ने कहा कि वह जिस स्थल का सीमांकन किये थे, उससे हटाकर नगरपालिका प्रशासन और सम्बन्धित ठेकेदार ने कार्य किया है। लगभग 19 बिस्वा अधिक जमीन को अधिग्रहीत कर नगरपालिका प्रशासन और सम्बन्धित ठेकेदार ने पार्क का निर्माण कार्य किया है। हाईकोर्ट के निर्देश पर अब नगरपालिका प्रशासन को 19 बिस्वा जमीन पर कराये गए निर्माण कार्य को ध्वस्त करना पड़ा।

वास्तव में इस कार्य के लिए प्रतापगढ़ के विधायक राजेंद्र कुमार मौर्य ने अथक प्रयास से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से प्राप्त किया था। अब मुख्यमंत्री के निर्देश पर जो कार्य प्राप्त हुआ हो उसमें भी राजस्व विभाग की इतनी बड़ी चूक कि किसी काश्तकार की भूमि को जबरन माप करके उसमें पार्क बना दिया जाए। यह भी तो किसी हिटलर शाही से कम नहीं। फिर भी नुकसान तो सरकारी धन का हुआ हुआ जो जनता के टैक्स का होता है।

यक्ष प्रश्न यह है कि मुख्यमंत्री के इस ड्रीम प्रोजेक्ट में घोर लापरवाही बरतने वालों के खिलाफ किस तरह कार्यवाही की जाती है ? कार्य पूरा भी नहीं हुआ और स्वयं के निर्माण कार्य पर नगरपालिका प्रशासन को हाईकोर्ट के आदेश पर अपने ही बुल्डोजर से उसे ध्वस्त करना पड़ा। सबसे अहम सवाल यह है कि इस ध्वस्तीकरण में जो सरकारी धन का नुकसान हुआ वह किससे वसूला जाएगा ?

सच कहा जाए तो किसी न किसी से इसकी रिकवरी होनी चाहिए। क्योंकि सरकार का जो भी धन है वह जनता के टैक्स से अर्जित धन होता है। इसलिए जवाबदेही तो तय होनी चाहिए। साथ ही रिकवरी भी हरहाल में होनी चाहिए। जब बात रिकवरी की होती है तो नगरपालिका प्रशासन राजस्व विभाग के ऊपर यह कहकर बच निकलता है कि उसे जो जमीन सरकारी बताकर दी गई थी, उस पर ही वह पार्क का निर्माण कार्य कराया है।

लिखित में नगरपालिका प्रशासन के पास कुछ भी नहीं है। सबकुछ मौखिक ही है। अभी प्रतापगढ़ बाईपास में ट्रामा सेंटर की भूमि आवंटन में भी यही कार्य किया गया था। एक ही नंबर की जमीन को सदर तहसील के कर्मचारियों एवं अधिकारियों ने दो अलग-अलग विभागों को आवंटित कर दिया। पहले ट्रामा सेंटर बना और बाद में बाईपास। आखिर इतनी बड़ी गलती कैसे हो जाती है कि जिस जमीन को आवंटित किया जाता है, वर्तमान में उसकी दशा क्या है ?

अब स्थिति यह है कि ट्रामा सेंटर बंद पड़ा है। बाईपास का एक सर्विस लेन चालू किया गया है और दूसरा सर्विस लेन अभी नहीं बनाया जा सका है। क्योंकि दूसरा सर्विस लेन बनेगा तो ट्रामा सेंटर टूटेगा। जब ट्रामा सेंटर टूटेगा तो उसकी भरपाई की बात फिर उठेगी। इसलिए उसे पुराना किया जा रहा है। ताकि यह बताया जा सके कि ट्रामा सेंटर इतने साल तक संचालित किया गया था। फिर टूटेगा तो जवाबदेही से बचा जा सकेगा।

जबकि एक सर्विस लेन से दोनों सर्विस लेन की आवाजाही में दुर्घटनाओं की बाढ़ सी आ गई है। फिर नकारा जिला प्रशासन और शासन मूक बधिर बना हुआ है। कुछ दिनों पूर्व एक दरोगा को यही एक सर्विस लेन निगल गया, क्योंकि दरोगा जी शहर की तरफ से बाईपास के सर्विस लेन की तरफ से अंतु अमेठी मार्ग जाने के लिए चढ़े ही थे कि सामने से अपनी सही तरफ से आ रहे डम्फर ने दरोगा जी को टक्कर मारकर भाग निकला। दरोगा जी को जीवन से हाथ धोना पड़ा था।

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