अदालत ने किरायेदार की सारी दलीलें को दरकिनार करते हुए भवन स्वामी के पक्ष में दिया अपना फैसला, पोषणीयता के आभाव में वाद हुआ निरस्त
प्रतापगढ़। कभी-कभी लोगों को गलतीफहमी हो जाती है और उस गलतफहमी में वह अपनी औकात भूल जाता है। एक किरायेदार को जब यह गलतफहमी हो जाय कि वह भवन स्वामी बन सकता है तो वह न भवन स्वामी बन पाता है और न ही किरायेदार रह पाता है। ऐसा ही एक किरायेदार प्रतापगढ़ चौक कचेहरी रोड़ फलमंडी के सामने खान मार्किट की दुकान नम्बर-1 के किरायेदार हलीम का हुआ।
चौक कचेहरी रोड़ फलमंडी के सामने खान मार्किट के स्वामी मतीन हैं और खान मार्किट में कुल 9 दुकानें हैं। दुकान नम्बर-1 का किरायेदार हलीम जो कई सालों से किरायेदार रहे, परन्तु उनके चार लड़के आशिफ, शारिफ, राही व कैफ जब से दुकान का संचालन करने लगे, तब से उनकी नियत खराब हो गई और वह किरायेदार से मकान बनने के लिए सारे हथकंडे अपनाने शुरू किये। परन्तु उनका एक हथकंडा काम न आ सका।
उत्तर प्रदेश शहरी भवन (किराया, किराया एवं बेदखली का विनियमन) अधिनियम, 1972 उत्तर प्रदेश, भारत के तहत रेन्ट कन्ट्रोल बाद संख्या- Misc. Civil Cases/674/2025 न्यायालय सिविल जज (जू० डि०) सदर, प्रतापगढ़ के यहाँ हलीम बनाम मतीन का वाद पोषणीय न होने की दशा में दिनांक- 03.09.2026 खारिज कर दिया।
पत्रावली पेश हुई। पुकार पर उभय पक्ष की ओर से विद्वान अधिवक्तागण उपस्थित। पूर्व में उभयपक्ष के विद्वान अधिवक्तागण को प्रार्थनापत्र कागज संख्या 3 के अंतर्गत धारा 29 उ0प्र0 एक्ट नंबर- 13 सन 1972 पर सुना जा चुका है। पत्रावली आज आदेशार्थ नियत है। निस्तारण प्रार्थना पत्र कागज संख्या- 3 के अंतर्गत धारा 29 उ0प्र0 एक्ट नंबर- 13 सन 1972 पर किया गया।
प्रार्थी हलीम की ओर से प्रार्थना पत्र उक प्रस्तुत कर कथन किया गया है कि याचिका के अन्त में वर्णित दुकान का पुराना किरायेदार है। 125/- रुपया प्रतिमाह की दर से किराया द्वितीय पक्ष को अदा करता चला आ रहा है। उभय पक्ष के मध्य किरायेदारी का विवाद चल रहा है, जो न्यायालय में लम्बित है। द्वितीय पक्ष याचिकाकर्ता को विवादित दुकान से जबरन निकालना चाहता है तथा आये दिन याची के दुकान पर तोड़फोड़ अतिक्रमण करता रहता है।
द्वितीय पक्ष का निवास भवन के प्रथम तल पर है, जिसके कारण द्वितीय पक्ष का आना जाना रहता है। द्वितीय पक्ष याची से निजी तौर पर भी दुश्मनी रखता है। द्वितीय पक्ष का परिवार असामाजिक तत्वों से हर तरह का संबंध बनाये हुए हैं और द्वितीय पक्ष के निवास पर असामाजिक तत्वों का जमावड़ा होता रहता है, जिससे द्वितीय पक्ष उसके मददगीरों का आतंक बना रहता है।
विपक्षी दिनांक- 11.10.2025 को रात एक बजे प्राथी के दुकान की छत पर आये दुकान बंद हो चुकी थी। प्रार्थी के दुकान की छत को तोड दिया और दुकान के अंदर सामान आदि तथा लगभग 80,000/- रुपये गल्ले में रखा था, उठा ले गये। विपक्षियों व उसके लड़के द्वारा दुकान तोड़ने के प्रक्रिया सी.सी.टी.वी. कैमरों में कैद हुयी। याची ने सी.सी.टी.बी. फुटेज व अन्य साक्ष्यों के आधार पर विपक्षी व उसके लड़के के विरुद्ध कोतवाली नगर प्रतापगढ़ में रिपोर्ट दर्ज करायी, जिसकी विवेचना जारी है।
प्रार्थी के दुकान की छत टूटी हुयी है, जिससे प्रार्थी का व्यवसाय क्षतिग्रस्त हो रहा है। विपक्षी व उसके परिवार व अन्य असामाजिक तत्वों के कारण प्रार्थी अपनी दुकान की छत व मरम्मत नहीं करा पा रहा है। याची ने इस घटना की सूचना जिलाधिकारी व नगरपालिका प्रतापगढ़ को दिया तथा प्रशासन से भी छत की रिपेयर कराने का अनुरोध किया, परन्तु अभी तक कोई कार्यवाही नहीं हुयी और याची की क्षति जारी है, जिससे बर्तमान याचिका दायर करने की आवश्यकता है।
वर्तमान याचिका का कारण दिनांक- 10.11.2025 बरवक्त तोडे जाने क्षति द्वारा विपक्षी न्यायालय के अधिकार में पैदा हुआ और जारी है। याची अपने दुकान पर काबिज है। विपक्षी को याची की दुकान की छत तोड़ने व याची के व्यवसाय में अवरोध पैदा करने तथा याची के जान व माल को असुरक्षित करने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है। याची की दुकान की छत क्षतिग्रस्त कर दिया है।
याची ने मकान मालिक से उनके द्वारा तोड़ी गयी छत का निर्माण कराने का अनुरोध किया, परन्तु विपक्षी ने कोई कार्यवाही नहीं की, जिससे याची निर्माण में लगने वाले व्यथ को स्वयं बहन करने को तैयार है। अन्त में प्रार्थी द्वारा प्रार्थना पत्र स्वीकार करते हुए याची की दुकान की मरम्मत कराने व आवश्यकतानुसार छत का निर्माण कराने की अनुमति प्रदान किये जाने और आवश्यकता हो तो पुलिस बल को भी निर्देशित किये जाने की याचना की गयी है।
विपक्षी की ओर से लिखित उत्तर कागज संख्या 18 क 2 प्रस्तुत कर प्रार्थी की याचिका में किये गये कथनों को मुख्यतः अस्वीकार करते हुए अपने अधिक कथन में कथन किया गया है कि याचिका अंतर्गत धारा 29 उ०प्र० एक्ट 13 सन 1972 वर्तमान समय में प्रभावी न होने के कारण प्रथम दृष्टया पोषणीय नहीं है एवं निरस्त होने योग्य है। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश नगरीय परिसर किरायेदारी अधिनियम, 2021 प्रभावी है।
उत्तर प्रदेश अधिनियम संख्या- 13 सन- 1972 को उत्तर प्रदेश नगरीय परिसर किरायेदारी विनियमन अधिनियम, 2021 लागू होने पर निरसित (Repealed) किया गया है व नवीन किरायेदारी अधिनियम यू० पी० एक्ट नंबर-16/2021 की प्रवर्तन तिथि 11.01.2021 से प्रभावी है। ऐसी स्थिति में निरसित कानून के आधार पर याची का कोई प्रार्थना पत्र प्रथम दृष्टया पोषणीय न होने के कारण निरस्त होने योग्य है।
उत्तरदाता की दुकान 70 वर्ष पुरानी रही है व बहुत ही जर्जर हो जाने के कारण वर्ष- 2023 में प्रार्थी के प्रार्थना पत्र पर नगरपालिका के द्वारा उक्त दुकान क्षतिग्रस्त होने के कारण तत्कालीन नगरपालिका के अधिकारियों के द्वारा स्थल का निरीक्षण कर किरायेदार को एक सप्ताह में दुकान खाली करने का निर्देश दिया था। उक्त समय अर्थात 2023 में ही दुकान का कुछ हिस्सा जर्जर होने के कारण गिर चुका था।
उक्त जर्जर दुकान गिरी होने के बावजूद भी किरायेदारी परिसर याची के द्वारा खाली नहीं किया था। कुछ सामान अन्दर पन्नी से ढककर रखा जाता रहा है। दिनांक 3-4 अक्टूबर, 2025 को संपूर्ण दुकान की छत ऊपर से तल में उत्तरदाता का हिस्सा सहित रात्रि में गिर गया, जिसकी सूचना उत्तरदाता के द्वारा पुलिस को दिया था।
दिनांक- 05.10.2025 को जिलाधिकारी महोदय प्रतापगढ़ को प्रार्थना पत्र देकर दुकान की वास्तविकता से अवगत कराया था एवं जानमाल का खतरा होने संबंधी प्रार्थनापत्र दिया था, जिस पर जिलाधिकारी महोदय ने जांचकर पक्षों को सुनकर प्रभावी निस्तारण नियमानुसार कराये जाने का आदेश पारित किया था।
किन्तु दुकान गिर जाने के बावजूद भी क्षतिग्रस्त गिरी दुकान के सामने पटरी पर दुकान लगाकर कार्य करता रहा एवं बदनियती से झूठी घटना दर्शाकर कानूनी राय से दिनांक- 11.10.2025 को याची एवं याची के लड़के के विरुद्ध झूठा वाद अपराध संख्या-508/2025 थाना कोतवाली नगर में पंजीकृत करा दिया, जबकि दुकान पूर्व में ही 3-4 अक्टूबर 2025 की रात्रि में दुकान की छत पूर्णरूपेण गिर गयी थी, जिसकी सूचना शीघ्र राजस्व एवं पुलिस अधिकारियों को दिया जा चुका था, जिसके तमाम अभिलेख उत्तरदाता के पास हैं।
याचि के द्वारा गलत तथ्यों के आधार पर निरस्त कानून के आधार पर वर्तमान प्रार्थनापत्र बदनियती से वास्तविक तथ्यों को छिपाते हुए न्यायालय में आवश्यक व अनर्गल कथन करते हुए प्रार्थनापत्र दिया है व छत का निर्माण कराने का अनुरोध किया है, पूर्णतः हास्यास्पद है। याची का प्रार्थनापत्र निरस्त होने योग्य है। याची के द्वारा क्या निर्माण कराया जाना है, कितना निर्माण कराया जाना है व निर्माण की लागत आदि तथ्यों को छिपाकर प्रार्थनापत्र प्रस्तुत करने के कारण भी प्रार्थी का प्रार्थनापत्र एक्ट नंबर- 13, सन- 1972 के तहत पोषणीय न होने के कारण निरस्त होने योग्य है। अतः याची का प्रार्थनापत्र निरस्त किये जाने की याचना की गयी है।
पत्रावली के अवलोकन से यह प्रकट होता है कि प्रार्थी के द्वारा प्रार्थना पत्र कागज संख्या- 3 क अंतर्गत धारा- 29 उ0प्र0 एक्ट नंबर- 13, सन- 1972 के अंतर्गत प्रस्तुत किया गया है, जबकि विपक्षी का यह कथन है कि उपरोक्त प्रार्थना पत्र जिस प्रावधान के अंतर्गत प्रस्तुत किया गया है, यह पोषणीय नहीं है। इस संबंध में उत्तर प्रदेश शहरी परिसर किरायेदारी विनियमन अधिनियम, 2021 की धारा 46(1) का उल्लेख किया जाना आवश्यक है जिसके तहत में पूर्व अधिनियम सन् 13, 1972 को निरसित किया गया है।
यद्दपि, धारा- 4G(2) में यह भी उपबंधित है कि उक्त निरसन के बाबजूद वे सभी बाद एवं अन्य कार्यवाहियों को जो साल- 2021 के अधिनियम के प्रारम्भ होने के समय 1972 के अधिनियम के अंतर्गत लंबित थी, उसी अधिनियम के अंतर्गत जारी रखकर निस्तारित की जाएगी अर्थात् निरसित अधिनियम के किसी प्रावधान का संरक्षण केवल उन्हीं कार्यवाहियों को प्राप्त है जो उसके निरसन के समय थी।
प्रस्तुत प्रकरण में यह तथ्य प्रदर्शित नहीं होता है कि प्रस्तुत प्रार्थना पत्र अंतर्गत धारा- 250 उ० प्र० एक्ट नंबर- 13, सन- 1972 के तहत वर्तमान कार्यवाही उत्तर प्रदेश शहरी परिसर किरायेदारी विनियमन अधिनियम- 2021 (अर्थात् दिनांक 11.01.2021) जो कि प्रभावी हुआ, के समय लम्बित थी। इसके विपरीत स्वयं प्रार्थी द्वारा यह वर्जित किया गया है कि घटना दिनांक- 11.10.2025 की है और वर्तमान प्रार्थना पत्र उक्त दिनांक के बाद प्रस्तुत किया गया है। अर्थात् धारा 46(2) के संरक्षण का लाभ वर्तमान कार्यवाही में नहीं दिया जा सकता है।
केवल यह तथ्य कि पक्षकारों के मध्य किरायेदारी से संबंधित कोई अन्य विवाद लम्बित है वह अपने आपमें बर्तमान पृथक कार्यवाही को साल-1972 के अधिनियम के अंतर्गत लंबित कार्यवाही का आधार नहीं बना सकता। इसके अतिरिक्त वर्तमान विधिक विधिक व्यवस्था में मरम्मत एवं परिसर के रख-रखाव के संबंध में उत्तर प्रदेश शहरी परिसर किराएदारी विनियमन अधिनियम- 2021 की धारा- 15 में विशिष्ट प्रावधान किया गया है, जिसमें मकान मालिक एवं किरायेदार को मरम्मत से संबंधित जिम्मेदारियां निर्धारित की गई हैं।
यदि मकान मालिक आपेक्षित मरम्मत कराने से इन्कार करता है तो अधिनियम में निर्धारित शतों के अधीन किरायेदार स्वयं ऐसी मरम्मत करा सकता है जो कि एक माह में ऐसी कटौती सहमत मालिक किराए के पचास प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती। यदि परिसर मरम्मत के बिना रहने योग्य नहीं हैं और मकान मालिक के लिखित रूप से कहे जाने के बाद भी मरम्मत नहीं कराता है तो अधिनिमय में किराएदार को निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार परिसर छोड़ने का अधिकार भी प्रदान किया गया है।
इस प्रकार वर्तमान विधिक व्यवस्था में केवल मरम्मत कराने की अनुमति प्राप्त कराने के उद्देश्य से निर्सिंत अधिनियम की धारा- 29 का सहारा नहीं लिया जा सकता। प्रार्थी के पास यदि अधिनियम- 2021 की धारा- 15 के अन्तर्गत मरम्मत से संबंधित कोई वैधानिक अधिकार प्राप्त है तो उसका प्रयोग उसी अधिनियम में निर्धारित प्रक्रिया एवं सीमाओं के अधीन किया जाना उचित होगा।
जहाँ तक कथित घटना को प्रार्थी के द्वारा तोड़े जाने एवं धनराशि ले जाने का आक्षेप है एवं विपक्षी ने भी यह कथन किया है कि वादग्रस्त परिसर की छत जर्जर अवसथा में होने के कारण गिरी है। यह एक विवादित प्रश्न है एवं यह पृथक अपराधिक कार्यवाही का प्रश्न है। फलस्वरूप प्रार्थी द्वारा प्रस्तुत प्रार्थनापत्र पोषणीय न होने के कारण निरस्त किए जाने योग्य है।
दोनों पक्षों के विद्वान अधिवक्ताओं की दलीलों को समझने और परखने के बाद सिविल जज (जू० डि०) सदर, प्रतापगढ़ सबा फातिमा ने अपने आदेश में कहा है कि प्रार्थी हलीम की ओर से प्रार्थना पत्र कागज संख्या- 3 क, अंतर्गत धारा- 29 उ. प्र. एक्ट नंबर 13, सन- 1972 निरस्त किया जाता है। पत्रावली आवश्यक कार्यवाही के पश्चात् दाखिल दफ्तर हो।