राजधानी के लिए अब गहन संरचनात्मक बदलाव जरूरी: सात साल से जहरीली दिल्ली-एनसीआर की सर्द हवाएं

Khulasaindia : दिल्ली-एनसीआर में सर्दियों का पीएम2.5 स्तर 2019 से 2025 तक लगातार खतरनाक बना हुआ है, इस बार भी अक्तूबर-मध्य नवंबर में औसत 164 तक पहुंचा। पराली का योगदान कम होने के बावजूद वाहन और स्थानीय प्रदूषण से हवा “गंभीर” श्रेणी में बनी रही। वहीं ओपीडी में सांस के मरीज 33 फीसदी तक बढ़े।  दिल्ली-एनसीआर की हवा हर साल सर्दियों में जहरीली हो जाती है। इस साल भी हालात अलग नहीं हैं।

पिछले सात वर्षों (2019-2025) के आंकड़े साफ बताते हैं कि सर्दियों में पीएम 2.5 का स्तर लगातार खतरनाक बना है। ऐसे में अक्तूबर – नवंबर के दौरान पीएम 2.5 का औसत 140 से 180 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के बीच रहा जो विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लयूएचओ) के सुरक्षित मानक 2.5 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से कई गुना अधिक है। कई बार 700-800 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर जो कि चरम स्तर तक पहुंच जाता है।

इसका खुलासा सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) की नई रिपोर्ट ने किया है। रिपोर्ट के अनुसार, 2019 से 2025 तक सर्दियों में दिल्ली-एनसीआर का पीएम 2.5 स्तर लगातार खतरनाक बना है, जिसमें कोई खास सुधार नहीं दिखा है। 2019 में जहां औसत पीएम 2.5 का स्तर 162 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर था और चरम स्तर 725 तक पहुंचा। 2020 में औसत बढ़कर 175.5 और चरम 733 रहा। 2021 में औसत 159.1 और चरम 776 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रिकॉर्ड हुआ।

2022 में हल्की गिरावट के साथ औसत 140.9 और चरम 406 रहा, लेकिन इसके बाद स्तर फिर बढ़ गया। 2023 में औसत 170.3 और चरम 580, 2024 में औसत 180.2 और चरम 732 दर्ज किया गया। इस साल यानी अक्तूबर-मध्य नवंबर में औसत 164.1 और चरम स्तर 464 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रहा। 22 मॉनिटरिंग स्टेशनों पर 59 दिनों में से 30 से ज्यादा दिनों में आठ घंटे का मानक टूटा। द्वारका सेक्टर-8 सबसे ज्यादा प्रभावित रहा, जहां 55 दिन सीओ का स्तर ऊंचा रहा।

उसके बाद जहांगीरपुरी और नॉर्थ कैंपस रहा। इस वर्ष मानसून में बाढ़ के कारण पंजाब-हरियाणा में पराली जलाने की घटनाएं काफी कम हुई हैं। शुरुआती सर्दियों में पराली का दैनिक योगदान अधिकांश दिनों में 5% से कम रहा और सिर्फ 12-13 नवंबर को 22% तक पहुंचा। पराली के कम योगदान से प्रदूषण की चरम सीमा थोड़ी कम हुई है, लेकिन अक्तूबर-नवंबर में हवा की गुणवत्ता (एक्यूआई) बहुत खराब से गंभीर श्रेणी में ही बनी रही, खासकर नवंबर में। सीएसई के शरणजीत कौर ने बताया कि पिछले साल के मुकाबले इस साल शुरुआती सर्दियों का औसत पीएम2.5 9 फीसदी कम रहा, लेकिन तीन साल के आधारभूत स्तर से तुलना करें तो यह औसत बिल्कुल नहीं बदला है।

इसका मतलब है कि प्रदूषण एक ही अस्वस्थ स्तर पर स्थिर हो गया है, और दिल्ली वायु गुणवत्ता के पिछले लाभों को खोने की कगार पर है। दिल्ली के कई इलाके अब हॉटस्पॉट बन चुके हैं, जहां प्रदूषण का स्तर खतरनाक रूप से ऊंचा है। 2018 में 13 ऐसे हॉटस्पॉट पहचाने गए थे, जो राष्ट्रीय मानक से ऊपर थे और शहर के औसत स्तर से भी अधिक प्रदूषित थे। इनमें नॉर्थ और ईस्ट दिल्ली सबसे अधिक प्रभावित हैं। जहांगीरपुरी सबसे प्रदूषित है, जहां सालाना पीएम2.5 औसत 119 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर है। बवाना और वजीरपुर में 113 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज हुआ।

सड़कों का व्यस्त समय सबसे घातक

सीएसई की कार्यकारी निदेशक (रिसर्च और एडवोकेसी) अनुमिता रॉयचौधरी ने बताया कि पीएम2.5, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और कार्बन मोनोऑक्साइड का यह कॉकटेल मुख्य रूप से वाहनों के उत्सर्जन और दहन स्रोतों से हो रहा है। सुबह (7-10 बजे) और शाम (6-9 बजे) के व्यस्त समय में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (जो यातायात के धुएं से सीधे जुड़ी है) और पीएम2.5 में एक साथ बढ़ोतरी होती है।

राजधानी के लिए अब गहन संरचनात्मक बदलाव जरूरी

सीएसई ने चेतावनी दी है कि छोटे-छोटे वृद्धिशील कदम अब काम नहीं करेंगे। दिल्ली ऐसे मोड़ पर है जहां या तो गहन संरचनात्मक कार्रवाई से प्रदूषण के ग्राफ को नीचे लाया जा सकता है, या यह खतरनाक रूप से ऊपर जा सकता है। सीएसई ने सभी सेगमेंट के लिए समयबद्ध रूप से महत्वाकांक्षी विद्युतीकरण लक्ष्य पूरे करना और पुराने वाहनों को हटाने की सिफारिश की।

अंतिम-मील कनेक्टिविटी, पैदल चलने और साइकिल चलाने के बुनियादी

ढांचे के साथ एकीकृत सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने का सुझाव दिया। इसके अलावा पार्किंग शुल्क और कंजेशन टैक्स लगाकर निजी वाहनों पर नियंत्रण का सुझाव दिया। सीएसई ने उद्योग को सस्ते और स्वच्छ ईंधन की ओर मोड़ने व बिजली संयंत्रों को उत्सर्जन मानकों को पूरा करने के लिए मजबूर करने की भी सिफारिश की।

ओपीडी में सांस संबंधी मरीजों की संख्या बढ़कर 33 फीसदी

दिल्ली की प्रदूषित आबोहवा का असर सांस की बीमारी से जूझने वाले मरीजों पर देखने को मिल रहा है। खासतौर पर ऐसे मरीज जिनका अस्थमा ठीक हो गया था। लेकिन प्रदूषण के बढ़ने से उनकी समस्याएं फिर से बढ़ गई हैं। खांसी, छाती में जकड़न, आंखों में जलन जैसे लक्षणों को लेकर भी मरीज पहुंच रहे हैं। अस्पतालों की ओपीडी में मरीजों की संख्या 33 फीसदी तक बढ़ गई है। दिल्ली के गुरु तेग बहादुर अस्पताल के एडिशनल मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ प्रवीण कुमार ने बताया कि ओपीडी में पॉल्यूशन बढ़ने के बाद से ओपीडी में आने वाले मरीजों की संख्या में इजाफा हुआ है।

उन्होंने कहा कि समस्या को कम करने के लिए जितना संभव हो घर पर रहें और बाहर जाते हुए मास्क लगाएं। वहीं, राजीव गांधी सुपरस्पेशलिस्ट हॉस्पिटल के ओपीडी में भी सांस संबंधी मरीजों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। राजधानी में एक दिन की राहत के बाद हवा फिर से जहरीली हो गई। सोमवार को सुबह की शुरुआत धुंध और हल्के कोहरे से हुई। वहीं, आसमान में स्मॉग की हल्की चादर भी दिखी। इसके चलते दृश्यता भी कम रही। लोग मास्क पहने नजर आए।

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