भारत कितना झेल सकता है बोझ,तेल की कीमत इससे ऊपर गई तो बढ़ जाएगा जोखिम
नई दिल्ली।भारत एक खास कीमत तक ही कच्चे तेल का भार उठा सकता है,लेकिन इससे ज्यादा कीमत होने पर ग्रोथ और महंगाई का जोखिम बढ़ने की आशंका है।यह बात अवेंडस वेल्थ की रिपोर्ट में कही गई है।रिपोर्ट के मुताबिक भारत की अर्थव्यवस्था में वित्त वर्ष 2026-27 में लगभग 90 डॉल्र प्रति बैरल की औसत कच्चे तेल की कीमतों को झेलने की क्षमता है,लेकिन कीमतें लंबे समय तक इस स्तर से ऊपर रहती हैं तो इससे ग्रोथ,महंगाई और बाहरी बैलेंस पर असर पड़ सकता है।
अपनी हालिया रिपोर्ट में अवेंडस वेल्थ कंपनी ने कहा कि भारत के मैक्रो फंडामेंटल मजबूत दिखते हैं।अर्थव्यवस्था वित्त वर्ष 2026-27 में लगभग 90 डॉलर प्रति बैरल की औसत ब्रेंट कीमत को झेल सकती है।हालांकि कीमतें लंबे समय तक इस स्तर से ऊपर रहती हैं तो इससे दिक्कतें शुरू होने के आसार हैं। अवेंडस वेल्थ के मुताबिक भारत इस क्षेत्र पर काफी हद तक निर्भर है।भारत का लगभग 47 फीसदी कच्चा तेल, 61 फीसदी एलपीजी और 29 फीसदी एलएनजी आयात होर्मुज स्ट्रेट से होकर आता है।
तेल की बढ़ी हुई कीमतों से इस तरह खतरा
तेल की बढ़ी हुई कीमतें भारत की मैक्रो-इकोनॉमिक स्थिरता के लिए सीधा खतरा हैं।अवेंडस ने इंस्टीट्यूशनल रिसर्च हाउस के अनुमानों का हवाला दिया।कहा कि कच्चे तेल की कीमतों में प्रति बैरल 10 डॉलर की बढ़ोतरी से भारत का चालू खाता घाटा लगभग 18 अरब डॉलर बढ़ सकता है।यह जीडीपी का लगभग 0.41 फीसदी है।इसका असर सिर्फ बाहरी बैलेंस तक ही सीमित नहीं है। रिपोर्ट में कहा गया है कि एनालिस्ट का अनुमान है कि ब्रेंट क्रूड की कीमत में हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी से वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की जीडीपी ग्रोथ रेट में 30-35 बेसिस पॉइंट की कमी आ सकती है।
महंगाई बढ़ने का डर
अवेंडस वेल्थ ने ऊर्जा की ऊंची कीमतों से महंगाई पर पड़ने वाले असर को भी उजागर किया।एमके,स्पार्क और कोटक की रिसर्च के अनुमानों के आधार पर अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं तो कंज्यूमर महंगाई दर भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के कम्फर्ट जोन तक या उससे ऊपर जा सकती है।होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने से ग्लोबल ऑयल मार्केट पर बड़ा असर पड़ सकता है।चूंकि दुनिया की लगभग एक-पांचवीं कच्चे तेल की सप्लाई इसी रास्ते से होती है।इसलिए इसमें बड़ी रुकावट आने से तेल की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं।
भारत के लिए अभी भी ये हैं पॉजिटिव फैक्टर
इन जोखिमों के बावजूद अवेंडस वेल्थ का मानना है कि भारत अनिश्चितता के इस दौर में अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में है।रिपोर्ट में लगभग 5.1 लाख करोड़ रुपये की कम्फर्टेबल सिस्टम लिक्विडिटी,लगभग 11 महीने के आयात को कवर करने के लिए पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार और सरकार की ओर से लगातार कैपिटल एक्सपेंडिचर के समर्थन का जिक्र किया गया है।इसमें यह भी कहा गया है कि कई सालों तक कर्ज कम करने और बेहतर कैश फ्लो की वजह से कंपनियों की बैलेंस शीट पहले के साइकल की तुलना में काफी बेहतर स्थिति में हैं। इससे उन्हें शॉर्ट-टर्म झटकों को झेलने की ज्यादा क्षमता मिलती है।नोट में कहा गया है,हालांकि एनर्जी की ऊंची कीमतें निकट भविष्य में मार्जिन पर दबाव डाल सकती हैं,लेकिन भारतीय कंपनियों की बेहतर फाइनेंशियल स्थिति उन्हें कैपेक्स बनाए रखने और हालात सामान्य होने पर ग्रोथ फिर से शुरू करने की क्षमता देती है।