भारत ने अपनी तरक्की के आंकड़ों से विश्व को चौंकाया,बड़े-बड़े अर्थशास्त्री और आलोचक रह गए दंग
नई दिल्ली।भारत ने उम्मीद से बेहतर आर्थिक विकास दर से एक बार फिर विश्व को चौंका दिया है।ग्लोबल अनिश्चितता, तेल की ऊंची कीमतें,विदेशी निवेशकों की बिकवाली,रुपये की कमजोरी और पश्चिम एशिया में तनाव जैसी चिंताओं के बावजूद भारत ने जबरदस्त ग्रोथ दर्ज की है।शुक्रवार को ये दमदार आंकड़े जारी होते ही दोबारा भारत की चर्चा विश्व में होने लगी।इस तेज आर्थिक रफ्तार उन आलोचकों और अर्थशास्त्रियों के लिए जवाब है,जो लगातार सरकार की नीतियों की आलोचना करते रहे हैं। बता दें कि भारत ने यह जबरदस्त ग्रोथ ऐसे समय हासिल की है जब विश्व में अनिश्चितता का माहौल है।कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं और रुपये पर दबाव है।
ये आंकड़े हैं शानदार
जनवरी-मार्च 2026 तिमाही में भारत की अर्थव्यवस्था में शानदार 7.8 फीसदी की बढ़ोतरी हुई।वित्त वर्ष 2025-26 के लिए पूरे साल की GDP ग्रोथ 7.7 फीसदी रही,जबकि ग्रॉस वैल्यू एडेड (GVA) में 7.9 फीसदी की बढ़ोतरी हुई।यह सभी सेक्टर में आर्थिक गतिविधियों की मजबूती को दिखाता है,ये आंकड़े विश्लेषकों के अनुमानों से ज्यादा रहे।
इन चीजों ने अर्थव्यवस्था को बढ़ाया आगे
मजबूत निवेश,जोरदार कंस्ट्रक्शन और बैंकिंग गतिविधियां, घरेलू मांग में मजबूती,सर्विस सेक्टर में अच्छी ग्रोथ और बेहतर कृषि प्रदर्शन ने अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाया।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस उपलब्धि की तारीफ करते हुए इसे सुधारों और 140 करोड़ भारतीयों की कड़ी मेहनत का नतीजा बताया।वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी अर्थव्यवस्था की मजबूत बुनियाद पर जोर दिया।हालांकि अर्थशास्त्रियों ने चेतावनी दी है कि सब्सिडी की बढ़ती लागत और पश्चिम एशिया में लंबे समय तक जारी रहने वाली रुकावटें आने वाले महीनों में ग्रोथ के लिए चुनौतियां पैदा कर सकती हैं।बीते रोज ये आंकड़े उसके कुछ घंटे बाद आए जब सरकार ने विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए कई उपाय घोषित किए। इनमें विदेशी निवेशकों को सरकारी प्रतिभूतियों से होने वाली ब्याज आय और पूंजीगत लाभ पर टैक्स से छूट देने वाला एक अध्यादेश भी शामिल है।
ऐसे होगा FII को फायदा
विदेशी संस्थागत निवेशकों को 12 महीने से अधिक समय तक रखे गए सरकारी बॉन्ड पर 12.5 फीसदी का लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स देना पड़ता था। अगर बॉन्ड 12 महीने से कम समय के लिए रखा जाता था तो शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स की दर 20 फीसदी थी। इन दोनों टैक्स को खत्म कर दिया गया है।सरकारी प्रतिभूतियों पर विदेशी निवेशकों की ओर से अर्जित ब्याज आय पर लगने वाले विदहोल्डिंग टैक्स को भी हटा दिया गया है।ये कदम विदेशी पूंजी के प्रवाह को बढ़ाने और उसके आउटफ्लो को रोकने के लिए उठाए गए हैं ताकि रुपये को सहारा मिल सके। साथ ही बढ़ते चालू खाता घाटे को नियंत्रित करने में मदद मिले।
घरेलू खर्च बना हुआ है मजबूत पिलर
घरेलू खर्च भारत की ग्रोथ स्टोरी के सबसे मजबूत पिलर में से एक है। कंज्यूमर गुड्स पर ज्यादा खर्च परिवारों के बीच उनकी आय के स्तर और खर्च करने की क्षमता को लेकर मजबूत भरोसे का भी संकेत है। GDP के आंकड़े बताते हैं कि भू-राजनीतिक अनिश्चितता और उसके आर्थिक नतीजों के बावजूद यह भरोसा कम से कम इस साल मार्च तक बना हुआ है। साल (2025-26) के दौरान GDP के फीसदी के रूप में PFCE यानी निजी अंतिम उपभोग व्यय (वास्तविक रूप में) 55.7 फीसदी रहा,जो पिछले साल के स्तर के बराबर है।
सामने है ये चुनौतियां
भारत अपनी ईंधन जरूरतों का लगभग 80 फीसदी आयात करता है।इससे भारत बाहरी अस्थिरता के प्रति संवेदनशील हो जाता है। विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती और चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के तौर पर भारत इस विकास इंजन को बाहरी तेल सप्लाई में रुकावट का बंधक नहीं बनने दे सकता।ईंधन और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों की बढ़ती मांग के कारण 2025-26 में घरेलू खपत में आयातित कच्चे तेल पर भारत की निर्भरता बढ़कर रिकॉर्ड 88.7 फीसदी हो गई है। यह 2023-24 में 87.8 फीसदी थी।भारत की तेल आयात निर्भरता 2021-22 में 85.5 फीसदी, 2020-21 में 84.4 फीसदी,2019-20 में 85 फीसदी और 2018-19 में 83.8 फीसदी थी। कुल कच्चे तेल का आयात अब 2025-26 में 245.3 MMT है, जो 2023-24 में 234.3 MMT था।ईंधन के बढ़ते बिलों का घरेलू खर्च पर असर मई से शुरू होने वाले महीनों के आंकड़ों में ही दिखाई देगा। ईंधन की बढ़ती कीमतों के अलावा डॉलर के मुकाबले रुपये में भारी गिरावट ने भी महंगाई को बढ़ावा दिया है और कीमतें बढ़ाई हैं।
महंगाई का दबाव बढ़ने की आशंका
आने वाले महीनों में महंगाई का दबाव बढ़ने की आशंका है। जैसा कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने 5 जून को संकेत दिया था। इस बढ़ोतरी के पीछे ईंधन की कीमतों में धीरे-धीरे होने वाली बढ़ोतरी और इस बात की संभावना है कि उत्पादक अपनी लागत का बोझ ग्राहकों पर डालेंगे और अपने सामान की अंतिम कीमतें बढ़ा देंगे।नीति निर्माता शायद दक्षिण-पश्चिम मानसून की चाल पर कड़ी नजर रखे हुए हैं,क्योंकि यह भारत की कृषि-अर्थव्यवस्था की जीवन-रेखा है।
गर्मियों की बारिश सामान्य समय से तीन दिन देरी से 4 जून को केरल पहुंची
गर्मियों की बारिश सामान्य समय से तीन दिन देरी से 4 जून को केरल पहुंची,जो भारतीय मुख्य भूमि पर इसका पहला पड़ाव है। अल नीनो की आहट भारत के मुख्य भौगोलिक इलाकों में मानसून की बारिश के फैलाव पर असर डाल सकती है।गर्मियों में कम बारिश और मैदानी इलाकों में बारिश का असमान वितरण खरीफ की फसल के उत्पादन पर असर डाल सकता है। इससे खाने-पीने की चीजों की महंगाई बढ़ सकती है। खेती और ग्रामीण आय को नुकसान पहुंच सकता है। इसका असर पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है, जिससे लोगों का खर्च कम होने की आशंका है।